(26)17-07-1969/“Techniques for attaining the stage of unmanifestness”

AW.(26)17-07-1969/“अव्यक्ति स्थिति बनाने की युक्तियां”

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(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)

“अव्यक्ति स्थिति बनाने की युक्तियां”

अव्यक्त स्थिति अच्छी लगती है या व्यक्त में आना अच्छा लगता है? अव्यक्त स्थिति में आवाज है? आवाज से परे रहना चाहते हो? जब आप सभी आवाज़ से परे रहने का प्रयत्न करते हो, अच्छा भी लगता है। तो फिर बापदादा को व्यक्त में क्यों बुलाते हो? हर वक्त अव्यक्त स्थिति में रहे, उसके लिए क्या पुरुषार्थ करना है? सिर्फ एक अक्षर बताओ। जिस एक अक्षर से अव्यक्त स्थिति रहे। कौनसा एक अक्षर याद रखेंगे जो अव्यक्त स्थिति बन जाये? मन्सा-वाचा-कर्मणा तीनों ही व्यक्त में होते अव्यक्त रहे इसके लिए एक अक्षर बताओ? (आत्म-अभिमानी बनना) आत्म-अभिमानी अर्थात् अव्यक्त स्थिति। लेकिन उस स्थिति के लिए याद क्या रखें? पुरुषार्थ क्या करें? धीरे-धीरे ऐसी स्थिति सभी की हो जायेगी। जो किसके अन्दर में जो बात होगी वह पहले से ही आप को मालूम पड़ेगा। इसलिए प्रैक्टिस करा रहे हैं। जितना-जितना अव्यक्त स्थिति में स्थित होंगे, कोई मुख से बोले न बोले लेकिन उनके अन्दर का भाव पहले से ही जान लेंगे। ऐसा समय आयेगा। इसलिए यह प्रैक्टिस कराते हैं।

तो पहली बात पूछ रहे थे कि एक अक्षर कौनसा याद रखें? अपने को मेहमान समझना। अगर मेहमान समझेंगे तो फिर जो अन्तिम सम्पूर्ण स्थिति का वर्णन है वह इस मेहमान बनने से होगी। अपने को मेहमान समझेंगे तो फिर व्यक्त में होते हुए भी अव्यक्त में रहेंगे। मेहमान का किसके साथ भी लगाव नहीं होता है। हम इस शरीर में भी मेहमान हैं। इस पुरानी दुनिया में भी मेहमान हैं। जब शरीर में ही मेहमान हैं तो शरीर से भी क्या लगन रखें। सिर्फ थोड़े समय के लिए यह शरीर काम में लाना है।

यहां मेहमान बनेंगे तो फिर वहाँ क्या बनेंगे? जितना यहाँ मेहमान बनेंगे उतना ही फिर वहाँ विश्व का मालिक बनेंगे। इस दुनिया के मालिक नहीं हैं। इस दुनिया में हम मेहमान हैं। नई दुनिया के मालिक हैं। यह जो व्यक्त भाव में आ जाते हैं तो उसका कारण यही है अपने को मेहमान नहीं समझते हैं। वस्तुओं पर भी अपना अधिकार समझते हैं। इसलिए उसमें अटैचमेंट हो जाती है। अपने को अगर मेहमान समझो तो फिर यह सभी बातें खत्म हो जायें।

अपना बैंक बैलेंस भी नोट करना है। जितना कमाते हैं उतना खाते हैं या कुछ जमा भी होता है। टोटल हिसाब निकाला है कितना जमा किया है? उस जमा के हिसाब से खुद अपने से सन्तुष्ट हो? (नहीं) तो जमा करने का और कोई समय रहा हुआ है? कितना समय है? समय भी नहीं है, सन्तुष्ट भी नहीं तो फिर क्या होगा? अभी सभी को यह खास ध्यान रखना चाहिए। अपना बैलेंस बढ़ाना चाहिए। कम से कम इतना तो होना चाहिए जो खुद सन्तुष्ट रहें। अपनी कमाई से खुद भी सन्तुष्ट नहीं रहेंगे तो औरों को क्या देंगे। एक एक को कितना जमा करना है? क्या सिर्फ अपने लिए ही जमा करना है या औरों के लिए भी करना है? औरों को दान करने के लिये जमा नहीं करना है? ऐसा समय अभी आयेगा जो सभी भिखारी रूप में आप लोगों से यह भीख मागेंगे। तो उन्हों को नहीं देंगे? इतना जमा करना पड़ेगा ना। अपने लिए तो करना ही है लेकिन साथ-साथ ऐसा दृश्य सभी के सामने होगा। जो आज अपने को भरपूर समझते हैं वह भी भिखारी के रूप में आप सभी से भीख मागेंगे। तो भीख कैसे दे सकेंगे? जब जमा होगा ना। दाता के बच्चे तो सभी देने वाले ठहरे। आप सभी के एक सेकेण्ड की दृष्टि के, अमूल्य बोल के भी प्यासे रहेंगे। ऐसा अन्तिम दृश्य अपने सामने रख पुरुषार्थ करो। ऐसा न हो कि दर पर आयी हुई कोई भूखी आत्मा खाली हाथ जाये। साकार में क्या करके दिखाया? कोई भी आत्मा असन्तुष्ट होकर न जाये। भल कैसी भी आत्मा हो लेकिन सन्तुष्ट होकर जाये। तो ऐसी बातें सोचनी चाहिए। सिर्फ अपने लिए नहीं।

अभी आप रचयिता हो। आप एक-एक रचयिता के पीछे फिर रचना भी है। माँ-बाप को जब तक बच्चे नहीं होते हैं, माँ-बाप की कमाई अपने प्रति ही होती है। जब रचना होती है तो फिर रचना का भी पूरा ध्यान रखना पड़ता है। अब अपने लिए जो कमाई थी वह तो बहुत समय खाया, मनाया। लेकिन अब अपनी रचना का भी ध्यान रखना है। आपने अपनी रचना देखी है? कितनी रचना है। छोटी है वा बड़ी है? बापदादा हरेक की रिजल्ट देखते हैं कि एक-एक सितारे की कितनी रचना है। जितनी यहाँ रचना होगी उतना वहाँ बड़ा राज्य होगा। यहाँ कितनी रचना रची है? अपनी रचना देखी है? भविष्य को जानते हो? रचयिता तो सभी हैं लेकिन बड़ी रचना की है या छोटी रचना की है? (आश तो बड़ी की है) बड़ी रचना के साथ फिर जिम्मेवारियां भी बड़ी हैं।

अध्याय: अव्यक्त स्थिति बनाने की युक्तियां — प्रश्न एवं उत्तर

मुरली-आधारित अध्ययन नोट्स
दिनांक: 26 अगस्त 2026

प्रश्न 1: अव्यक्त स्थिति का अर्थ क्या है?

उत्तर: अव्यक्त स्थिति का अर्थ है — व्यक्त भाव से न्यारा रहकर आत्म-अभिमानी स्थिति में स्थित होना। मन, वाणी और कर्म से कार्य करते हुए भी अंदर से देह-अभिमान और अटैचमेंट से मुक्त रहना।


प्रश्न 2: अव्यक्त स्थिति में स्थित रहने के लिए एक अक्षर की युक्ति क्या है?

उत्तर: अपने को “मेहमान” समझना।

जब हम स्वयं को इस शरीर और पुरानी दुनिया में मेहमान समझते हैं, तो उनसे अनावश्यक लगाव कम होने लगता है।


प्रश्न 3: अपने को मेहमान समझने से क्या लाभ होता है?

उत्तर: मेहमान किसी वस्तु या स्थान को अपना स्थायी अधिकार नहीं समझता। इसी प्रकार स्वयं को मेहमान समझने से शरीर, वस्तुओं, संबंधों और परिस्थितियों के प्रति अटैचमेंट कम होती है और हम व्यक्त में रहते हुए भी अव्यक्त स्थिति का अनुभव कर सकते हैं।


प्रश्न 4: हमें इस शरीर के प्रति कैसी दृष्टि रखनी चाहिए?

उत्तर: हमें समझना चाहिए कि “मैं इस शरीर में मेहमान हूँ।” यह शरीर स्थायी नहीं है। हमें इसे अपनी सेवा और कर्म के लिए कुछ समय तक उपयोग करना है, लेकिन इसे ही अपनी वास्तविक पहचान नहीं समझना है।


प्रश्न 5: इस पुरानी दुनिया के प्रति हमारी क्या स्मृति होनी चाहिए?

उत्तर: “मैं इस पुरानी दुनिया में भी मेहमान हूँ।” इस दुनिया को स्थायी घर समझने के बजाय हमें अपनी आत्मिक पहचान और नई दुनिया के भविष्य को स्मृति में रखना है।


प्रश्न 6: व्यक्त में रहते हुए अव्यक्त कैसे रह सकते हैं?

उत्तर: कर्म करते हुए भी आत्म-अभिमानी स्थिति में रहना है। बोलना है, कार्य करना है और जिम्मेदारियां निभानी हैं, लेकिन मन में यह स्मृति रखनी है कि “मैं आत्मा हूँ और इस भूमिका को निभा रहा हूँ।”


प्रश्न 7: अव्यक्त स्थिति में स्थित होने से कौन-सी विशेष शक्ति विकसित होती है?

उत्तर: आत्माओं के भाव और स्थिति को समझने की सूक्ष्म शक्ति विकसित होती है। कई बार सामने वाला कुछ कहे बिना भी उसके मन की स्थिति को अनुभव किया जा सकता है। इसलिए अव्यक्त स्थिति की प्रैक्टिस कराई जा रही है।


प्रश्न 8: आध्यात्मिक “बैंक बैलेंस” से क्या तात्पर्य है?

उत्तर: बैंक बैलेंस की तरह हमें अपना आध्यात्मिक बैलेंस भी देखना है — मैंने ज्ञान, योग, पवित्रता, शान्ति, शक्ति, प्रेम, शुभभावना और सेवा का कितना धन जमा किया है?


प्रश्न 9: हमें अपने आध्यात्मिक बैंक बैलेंस को क्यों बढ़ाना चाहिए?

उत्तर: केवल स्वयं को संतुष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य में दूसरों को भी शान्ति, शक्ति और सहयोग देने के लिए। यदि हमारे पास आध्यात्मिक खजाना जमा नहीं होगा, तो हम दूसरों को क्या दे सकेंगे?


प्रश्न 10: “दाता के बच्चे” होने का अर्थ क्या है?

उत्तर: दाता के बच्चे स्वयं भी देने वाले होते हैं। हमें अपनी दृष्टि, बोल, समय, ज्ञान, शान्ति, प्रेम और शक्ति द्वारा आत्माओं की सेवा करनी है।


प्रश्न 11: “कोई आत्मा खाली हाथ न जाए” का क्या भाव है?

उत्तर: हमारे संपर्क में आने वाली आत्मा को कम-से-कम शान्ति, सम्मान, प्रेम, शुभभावना या हिम्मत मिले। हमारा व्यवहार ऐसा हो कि कोई आत्मा असन्तुष्ट होकर न जाए।


प्रश्न 12: रचयिता और रचना का उदाहरण क्यों दिया गया है?

उत्तर: क्योंकि जब रचना होती है तो रचयिता की जिम्मेदारी भी बढ़ती है। इसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन में हमें केवल अपने पुरुषार्थ तक सीमित नहीं रहना है, बल्कि जिन आत्माओं की सेवा और पालना की जिम्मेदारी मिली है, उनकी भी उन्नति का ध्यान रखना है।


प्रश्न 13: अपनी रचना को कैसे पहचान सकते हैं?

उत्तर: यह देखना है कि मेरे संपर्क से कितनी आत्माओं को ज्ञान, योग, शान्ति, शक्ति और प्रेरणा मिली। मेरी सेवा से कितनी आत्माओं को आगे बढ़ने का अवसर मिला — यही अपनी रचना को पहचानने का एक आधार

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