J.D.BK ज्ञान 3-3 क्या कर्मों के बंधन को केवल तपस्या से मिटाया जा सकता है।
(प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं)
क्या कर्मों के बंधन को केवल तपस्या से मिटाया जा सकता है?
भूमिका : कर्मों के बंधन का मूल प्रश्न
आज का मुख्य प्रश्न यही है —
क्या कर्मों के बंधन को केवल तपस्या से मिटाया जा सकता है?
जैन धर्म में तपस्या को बहुत बड़ा स्थान दिया गया है।
मान्यता है कि तपस्या द्वारा ही पाप कर्म नष्ट होते हैं,
और आत्मा सिद्ध बनकर मोक्ष को प्राप्त करती है।
महावीर जी के अनुसार —
हमारे पाप कर्मों का कारण देह है।
तो प्रश्न उठता है —
क्या सचमुच देह ही पाप का कारण है?
क्या आत्मा देह के बिना पतित नहीं बनती?
और क्या केवल शरीर को कष्ट देने से आत्मा पावन बन सकती है?
जैन दर्शन में तपस्या की परंपरा
भारत भूमि को तपस्या की भूमि कहा जाता है।
जैन धर्म में तपस्या के अनेक कठोर रूप देखने को मिलते हैं —
✦ कठोर उपवास
-
24 घंटे भोजन नहीं
-
2 दिन, 3 दिन, केवल जल आहार
-
जीवनभर संयम का अभ्यास
✦ व्रत और नियम
-
सूर्य उदय से पहले उठना
-
सूर्यास्त के बाद सो जाना
-
दिन में न सोना
-
महीनों तक मौन व्रत
✦ शरीर को कष्ट देना
-
जंगलों में साधना
-
धूप में खड़े रहना
-
ठंडे पानी में खड़े रहना
-
एक टांग पर खड़े होकर तप
✦ अहिंसा की चरम साधना
-
नंगे पैर चलना
-
मुख पर पट्टी
-
चींटी तक को कष्ट न पहुँचे
✦ त्याग की पराकाष्ठा
-
श्वेतांबर – सफेद वस्त्र
-
दिगंबर – वस्त्र त्याग
-
दवाइयों का त्याग
-
बाल नोचना (सबसे बड़ी तपस्या)
मान्यता है —
शरीर पाप कराता है, इसलिए शरीर को दंड देना जरूरी है।
लेकिन असली प्रश्न फिर वही खड़ा होता है…
क्या सचमुच शरीर पाप करता है?
या पाप आत्मा करती है?
ब्रह्मा कुमारीज का सिद्धांत : कर्म आत्मा करती है
मुरली — 12 अक्टूबर 1966
“मनुष्य साधना तो करता है, पर सिद्धांत को नहीं जानता।”
बाबा स्पष्ट कहते हैं —
✔ कर्म आत्मा करती है
✔ कर्म का संस्कार आत्मा में बैठता है
✔ मन, बुद्धि और संस्कार आत्मा की फैकल्टी हैं
जैसे —
बार-बार कपड़े पर दाग लगें तो कपड़ा भारी हो जाता है,
वैसे ही आत्मा कर्मों से भारी हो जाती है।
देह तो साधन है।
मालिक आत्मा है।
पेट पाप नहीं करता, आत्मा करती है।
तपस्या का सही अर्थ क्या है?
आज तपस्या को लोग समझते हैं —
शरीर को कष्ट देना
भूखा रहना
इंद्रियों को जबरदस्ती दबाना
इच्छाओं को कुचलना
लेकिन बाबा कहते हैं —
मुरली — 10 जुलाई 1966
“तप से कर्म नहीं कटते। योग से कर्म भस्म होते हैं।”
समस्या आत्मा की है
और इलाज शरीर का किया जा रहा है — यह गलत है।
उदाहरण
जैसे बीमारी पेट में हो
और दवा हाथ पर लगाई जाए
तो पेट ठीक नहीं होगा।
योग की अग्नि से कर्म भस्म होते हैं
असली तपस्या क्या है?
✔ आत्मा का परमात्मा से जुड़ना
✔ श्रीमत पर चलना
✔ हर कर्म ईश्वरीय दिशा में करना
✔ विकारों से बचना
✔ आत्म-अभिमानी बनना
यही है —
योग की अग्नि
जब आत्मा परमात्मा से जुड़ती है —
तो पाप कर्म होते ही नहीं
और पुराने कर्म योग की अग्नि में भस्म हो जाते हैं।
तपस्वी भी बंधन में क्यों रहते हैं?
तपस्वियों में भी —
-
क्रोध
-
अहंकार
-
आसक्ति
-
मोह
रहता है।
अक्सर तपस्या से अहंकार और बढ़ जाता है —
“मैंने तप किया है।”
लेकिन योग विनम्र बनाता है।
योग आत्मा को पावन बनाता है।
निष्कर्ष : कर्मों से मुक्ति का सच्चा मार्ग
✔ तपस्या शरीर को सुधारती है
✔ योग आत्मा को पावन बनाता है
✔ कर्म आत्मा करती है
✔ कर्म का बंधन आत्मा पर लगता है
✔ मुक्ति आत्मा को चाहिए
इसलिए —
कर्मों के बंधन से मुक्ति केवल योग से मिलती है।
राजयोग ही सच्चा मोक्ष मार्ग है।
प्रश्न 1:
क्या कर्मों के बंधन को केवल तपस्या से मिटाया जा सकता है?
उत्तर:
जैन दर्शन में तपस्या को कर्मों के नाश का मुख्य साधन माना गया है। मान्यता है कि कठोर तपस्या द्वारा आत्मा अपने पाप कर्मों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त कर सकती है।
लेकिन ब्रह्मा कुमारीज ज्ञान के अनुसार केवल शरीर को कष्ट देने से आत्मा के कर्म नहीं कटते।
कर्म आत्मा करती है और उनका संस्कार आत्मा पर बैठता है। इसलिए कर्मों के नाश के लिए आत्मा का शुद्ध होना आवश्यक है, न कि केवल शरीर का कष्ट।
प्रश्न 2:
क्या सचमुच देह ही पाप कर्मों का कारण है?
उत्तर:
महावीर जी के अनुसार पाप कर्मों का कारण देह है, क्योंकि आत्मा देह में आकर देह के प्रभाव में गलत कर्म करती है।
लेकिन ब्रह्मा कुमारीज ज्ञान कहता है —
देह केवल साधन है, कर्ता आत्मा है।
कर्म आत्मा करती है और उसका फल भी आत्मा को ही भोगना पड़ता है।
इसलिए देह नहीं, बल्कि आत्मा की अवस्था ही पाप या पुण्य का कारण बनती है।
प्रश्न 3:
क्या आत्मा देह के बिना पतित नहीं बनती?
उत्तर:
आत्मा जब तक परमधाम में रहती है, तब तक वह पवित्र होती है।
देह में आने के बाद ही आत्मा कर्म करती है और संस्कार बनते हैं।
लेकिन पतित बनने का कारण देह नहीं, बल्कि देह-अभिमान है।
जब आत्मा अपने को शरीर समझने लगती है, तभी विकारों में गिरती है।
प्रश्न 4:
जैन दर्शन में तपस्या के कौन-कौन से रूप बताए गए हैं?
उत्तर:
जैन परंपरा में तपस्या के अनेक कठोर रूप हैं जैसे —
-
24 घंटे, 2 दिन, 3 दिन का उपवास
-
केवल जल आहार
-
महीनों तक मौन व्रत
-
जंगलों में साधना
-
धूप में या ठंडे पानी में खड़े रहना
-
नंगे पैर चलना, मुख पर पट्टी
-
वस्त्र त्याग (दिगंबर)
-
बाल नोचना
-
दवाइयों का त्याग
मान्यता है कि शरीर को दंड देने से पाप नष्ट होते हैं।
प्रश्न 5:
क्या सचमुच शरीर पाप करता है या आत्मा?
उत्तर:
मुरली — 12 अक्टूबर 1966
“मनुष्य साधना तो करता है, पर सिद्धांत को नहीं जानता।”
बाबा स्पष्ट कहते हैं —
✔ कर्म आत्मा करती है
✔ कर्म का संस्कार आत्मा में बैठता है
✔ मन, बुद्धि और संस्कार आत्मा की फैकल्टी हैं
जैसे कपड़े पर बार-बार दाग लगें तो कपड़ा भारी हो जाता है,
वैसे ही आत्मा कर्मों से भारी हो जाती है।
इसलिए पाप शरीर नहीं करता, पाप आत्मा करती है।
प्रश्न 6:
तपस्या का सही अर्थ क्या है?
उत्तर:
आज तपस्या को लोग समझते हैं —
-
शरीर को कष्ट देना
-
भूखा रहना
-
इंद्रियों को दबाना
-
इच्छाओं को कुचलना
लेकिन ब्रह्मा कुमारीज ज्ञान के अनुसार यह सच्ची तपस्या नहीं है।
मुरली — 10 जुलाई 1966
“तप से कर्म नहीं कटते। योग से कर्म भस्म होते हैं।”
समस्या आत्मा की है और इलाज शरीर का किया जा रहा है — यह गलत है।
प्रश्न 7:
योग की अग्नि क्या है?
उत्तर:
योग की अग्नि का अर्थ है —
✔ आत्मा का परमात्मा से जुड़ना
✔ श्रीमत पर चलना
✔ हर कर्म ईश्वरीय दिशा में करना
✔ विकारों से बचना
✔ आत्म-अभिमानी बनना
जब आत्मा परमात्मा से जुड़ जाती है,
तो पाप कर्म होते ही नहीं
और पुराने कर्म योग की अग्नि में भस्म हो जाते हैं।
प्रश्न 8:
तपस्वी भी बंधन में क्यों रहते हैं?
उत्तर:
अनेक तपस्वियों में भी —
-
क्रोध
-
अहंकार
-
आसक्ति
-
मोह
पाया जाता है।
कई बार तपस्या से अहंकार और बढ़ जाता है —
“मैंने तप किया है।”
लेकिन योग आत्मा को विनम्र बनाता है और पवित्र बनाता है।
प्रश्न 9:
कर्मों से मुक्ति का सच्चा मार्ग क्या है?
उत्तर:
✔ तपस्या शरीर को सुधारती है
✔ योग आत्मा को पावन बनाता है
✔ कर्म आत्मा करती है
✔ कर्म का बंधन आत्मा पर लगता है
✔ मुक्ति आत्मा को चाहिए
इसलिए कर्मों के बंधन से मुक्ति केवल योग से मिलती है।
राजयोग ही सच्चा मोक्ष मार्ग है।
निष्कर्ष
तपस्या से शरीर सुधरता है,
लेकिन आत्मा को पावन बनाने के लिए
परमात्मा से योग आवश्यक है।
योग ही सच्ची तपस्या है।
योग ही कर्मों से मुक्ति का मार्ग है।
Disclaimer (डिस्क्लेमर)
यह प्रवचन ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा सिखाए गए आध्यात्मिक ज्ञान पर आधारित है,
जो श्रीमद्भगवत गीता एवं साकार व अव्यक्त मुरलियों के अध्ययन से प्रस्तुत किया गया है।
इसका उद्देश्य किसी भी धर्म, साधना, तपस्या या परंपरा का खंडन करना नहीं,
बल्कि कर्मों के बंधन से मुक्ति के आध्यात्मिक सिद्धांत को स्पष्ट करना है।
यह ज्ञान आत्मिक शांति, आत्म-उन्नति और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन के लिए है।
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