AV-03/25-02-1991-“सोच और कर्म में समानता लाना ही परमात्म प्यार निभाना है”
“सोच और कर्म में समानता लाना ही परमात्म प्यार निभाना है”
आज बापदादा अपने सर्व स्वराज्य अधिकारी बच्चों को देख हर्षित हो रहे हैं क्योंकि स्वराज्य अधिकारी वही अनेक जन्म विश्व राज्य अधिकारी बनते हैं। तो आज डबल विदेशी बच्चों से बापदादा स्वराज्य का समाचार पूछ रहे हैं। हर एक राज्य अधिकारी का राज्य अच्छी तरह से चल रहा है? आपके राज्य चलाने वाले साथी सहयोगी साथी, सदा समय पर यथार्थ रीति से सहयोग दे रहे हैं कि बीच-बीच में कभी धोखा भी दे देते हैं? जितने भी सहयोगी कर्मचारी कर्मेन्द्रियां, चाहे स्थूल हैं, चाहे सूक्ष्म हैं, सभी आपके आर्डर में है? जिसको जिस समय जो आर्डर करो उसी समय उसी विधि से आपके मददगार बनते हैं? रोज अपनी राज्य दरबार लगाते हो? राज्य कारोबारी सभी 100 प्रतिशत आज्ञाकारी, वफादार, एवररेडी हैं? क्या हालचाल है? अच्छा है वा बहुत अच्छा है वा बहुत, बहुत, बहुत अच्छा है? राज्य दरबार अच्छी तरह से सदा सफलतापूर्वक होती है वा कभी-कभी कोई सहयोगी कर्मचारी हलचल तो नहीं करते हैं? इस पुरानी दुनिया की राज्य सभा का हालचाल तो अच्छी तरह से जानते हो – न लॉ है, न आर्डर है। लेकिन आपकी राज्य दरबार लॉ फुल भी है और सदा हाँ जी, जी हाजिर – इस आर्डर में चलती है। जितना राज्य अधिकारी शक्तिशाली है उतना राज्य सहयोगी कर्मचारी भी स्वत: ही सदा इशारे से चलते, राज्य अधिकारी ने आर्डर दिया कि यह नहीं सुनना है और यह नहीं करना है, नहीं बोलना है, तो सेकेण्ड में इशारे प्रमाण कार्य करें। ऐसे नहीं कि आपने आर्डर किया – नहीं देखो और वह देख करके फिर माफी मांगे कि मेरी गलती हो गई। करने के बाद सोचे तो उसको समझदार साथी कहेंगे? मन को आर्डर दिया कि व्यर्थ नहीं सोचो, सेकेण्ड में फुल स्टॉप, दो सेकेण्ड भी नहीं लगने चाहिए। इसको कहा जाता है – युक्तियुक्त राज्य दरबार। ऐसे राज्य अधिकारी बने हो? रोज राज्य दरबार लगाते हो या जब याद आता है तब आर्डर देते हो? रोज दिन समाप्त होते अपने सहयोगी कर्मचारियों को चेक करो। अगर कोई भी कर्मेन्द्रियों से वा कर्मचारी से बार-बार गलती होती रहती है तो गलत कार्य करते-करते संस्कार पक्के हो जाते हैं। फिर चेंज करने में समय और मेहनत भी लगती है। उसी समय चेक किया और चेंज करने की शक्ति दी तो सदा के लिए ठीक हो जायेंगे। सिर्फ बार-बार चेक करते रहो कि यह रांग है, यह ठीक नहीं है और उसको चेंज करने की युक्ति व नॉलेज की शक्ति नहीं दी तो सिर्फ बार-बार चेक करने से भी परिवर्तन नहीं होता। इसलिए पहले सदा कर्मेन्द्रियों को नॉलेज की शक्ति से चेंज करो। सिर्फ यह नहीं सोचो कि यह रांग है। लेकिन राइट क्या है और राइट पर चलने की विधि स्पष्ट हो। अगर किसी को कहते रहेंगे तो कहने से परिवर्तन नहीं होगा लेकिन कहने के साथ-साथ विधि स्पष्ट करो तो सिद्धि हो। जो आत्मा स्वराज्य चलाने में सफल रहती है तो सफल राज्य अधिकारी की निशानी है वह सदा अपने पुरुषार्थ से और साथ-साथ जो भी सम्पर्क में आने वाली आत्माएं हैं वह भी सदा उस सफल आत्मा से सन्तुष्ट होंगी और सदा दिल से उस आत्मा के प्रति शुक्रिया निकलता रहेगा। सर्व के दिल से, सदा दिल के साज से वाह-वाह के गीत बजते रहेंगे, उनके कानों में सर्व द्वारा यह वाह-वाह का शुक्रिया का संगीत सुनाई देगा। यह गीत आटोमेटिक है। इसके लिए टेपरिकार्डर बजाना नहीं पड़ता। इसके लिए कोई साधनों की आवश्यकता नहीं। यह अनहद गीत है। तो ऐसे सफल राज्य अधिकारी बने हो? क्योंकि अभी के सफल राज्य अधिकारी भविष्य में सफलता का फल विश्व का राज्य प्राप्त करेंगे। अगर सम्पूर्ण सफलता नहीं, कभी कैसे हैं, कभी कैसे हैं, कभी 100 प्रतिशत सफलता है, कभी सिर्फ सफलता है। 100 प्रतिशत सफल नहीं हैं तो ऐसे राज्य अधिकारी आत्मा को विश्व का, राज्य का तख्त, ताज प्राप्त नहीं होता लेकिन रॉयल फैमिली में आ जाता है। एक हैं तख्तनशीन और दूसरे हैं तख्तनशीन रॉयल फैमिली। तख्त नशीन अर्थात् वर्तमान समय भी सदा डबल तख्तनशीन रहे। डबल तख्त कौन सा? एक अकाल तख्त और दूसरा बाप का दिल तख्त। तो जो अभी सदा डबल तख्त नशीन है, कभी-कभी वाला नहीं, ऐसे सदा दिलतख्तनशीन विश्व का भी तख्तनशीन होता है। तो चेक करो – सारे दिन में डबल तख्तनशीन रहे? अगर तख्तनशीन नहीं तो आपके सहयोगी कर्मचारी कर्मेन्द्रियां भी आपके आर्डर पर नहीं चल सकतीं। राजा का आर्डर माना जाता है। राज्य (तख्त) पर नहीं हो और वह आर्डर करे तो माना नहीं जाता है। आजकल तो तख्त के बजाए कुर्सी हो गई है, तख्त तो खत्म हो गया। योग्य नहीं है तो तख्त गायब हो गया है। कुर्सी पर हैं तो सब मानेंगे। अगर कुर्सी पर भी नहीं हैं तो सब नहीं मानेंगे। लेकिन आप तो कुर्सी वाले नेता नहीं हो। स्वराज्य अधिकारी राजे हो। सभी राजा हो कि कोई प्रजा भी है? राजयोगी अर्थात् राजा। देखो कितने पद्म पद्म पद्म भाग्यवान हो! दुनिया, उसमें भी विशेष विदेश हलचल में है। वह वार और हार की दुविधा में है। कोई हार रहा है, कोई वार कर रहा है और कोई हालचाल सुन करके उसी हलचल में है। तो वह है हार और वार की हलचल में और आप हो बापदादा के प्यार में। परमात्म प्यार दूर-दूर से खेंच कर लाया है। कैसी भी परिस्थितियां हो लेकिन परमात्म प्यार के आगे परिस्थितियां रोक नहीं सकतीं। परमात्म प्यार बुद्धिवान की बुद्धि बन परिस्थिति को श्रेष्ठ स्थिति में बदल लेता है। डबल विदेशियों में भी देखो पहले पोलेण्ड वाले कितने प्रयत्न करते थे, असम्भव लगता था और अभी क्या लगता है? रशिया वाले भी असम्भव समझते थे, चाहे 24 घण्टा भी लाइन में खड़ा रहना पड़ा, पहुँच तो गये ना। मुश्किल सहज हो गया। तो शुक्रिया कहेंगे ना। ऐसे ही सदा होता रहेगा। कई सोचते हैं अन्त में विमान बन्द हो जायेंगे फिर हम कैसे जायेंगे? परमात्म प्यार में वह शक्ति है जो किसी की आंखों में ऐसा जादू कर देगी जो वह आपके भेजने लिए परवश हो जायेंगे लेकिन सिर्फ प्यार करने वाले नहीं, लेकिन निभाने वाले हों। निभाने वाली आत्माओं से बाप का भी वायदा है – अन्त तक हर समस्या को पार करने में प्रीति की रीति निभाते रहेंगे। कभी-कभी प्रीत करने वाले नहीं बनना। सदा निभाने वाले। प्रीत करना अनेकों को आता है लेकिन निभाना कोई-कोई को आता है इसलिए आप कोई में कोई हो।
बापदादा सदैव डबल विदेशी बच्चों को देख खुश होते हैं क्योंकि हिम्मत से बाप की मदद के पात्र बन अनेक प्रकार की माया के बॉन्डेज और अनेक प्रकार के रीति, रिवाज और रस्म के बाउन्ड्रीज़ को पार करके पहुँच गये हैं। यह हिम्मत भी कम नहीं है। हिम्मत सभी ने अच्छी रखी है। चाहे नये हैं, चाहे पुराने हैं, दोनों बैठे हैं। बहुत पुराने से पुराने भी हैं और इस कल्प के नये भी हैं। दोनों की हिम्मत अच्छी है। इस हिम्मत में तो सभी नम्बरवन हो फिर नम्बर किस बात में है? डबल विदेशी विशेष पुरुषार्थ करते हैं और रूहरिहान में भी कहते हैं – 108 की माला में जरूर आयेंगे। कोई क्वेश्चन करते हैं कि आ सकते हैं? आने अवश्य हैं। डबल विदेशियों के लिए भी माला में सीट रिजर्व्ड है। लेकिन कौन और कितने – वह आगे चल सुनायेंगे। तो नम्बर क्यों बनते हैं? हर एक अपने अधिकार से कहते हो – मेरा बाबा है। तो अधिकार भी पूरा है फिर भी नम्बर क्यों? जो नम्बरवन होगा और नम्बर आठ होगा, दोनों में अन्तर तो होगा ना! इतना अन्तर क्यों पड़ता? 16 हजार की तो बात छोड़ो, 108 में भी देखो – कहाँ एक, कहाँ 108। तो क्या अन्तर हुआ? हिम्मत में सब पास हो लेकिन हिम्मत के रिटर्न में जो बाप और ब्राह्मण परिवार द्वारा मदद मिलती है, उस मदद को प्राप्त कर कार्य में लगाना और समय पर मदद का यूज़ करना, जिस समय जो मदद अर्थात् शक्ति चाहिए उसी शक्ति द्वारा समय पर काम लेना, यह निर्णय शक्ति और कार्य में लगाने की कार्य शक्ति इसमें अन्तर हो जाता है। सर्वशक्तिवान बाप द्वारा सर्व शक्तियों का वर्सा सभी को मिलता है। कोई को 8 शक्ति, कोई को 6 शक्ति नहीं मिलती। सर्वशक्तियां मिलती हैं। पहले भी सुनाया ना कि विधि से सिद्धि होती है। कार्य शक्ति की विधि – एक है बाप के बनने की विधि, दूसरी है बाप से वर्सा प्राप्त करने की विधि और तीसरी है प्राप्त किये हुए वर्से को कार्य में लगाने की विधि। कार्य में लगाने की विधि में अन्तर हो जाता है। प्वॉइन्ट्स सबके पास है। एक टॉपिक पर वर्कशॉप करते हो तो कितने प्वॉइन्ट्स निकालते हो! तो एक प्वॉइन्ट बुद्धि में रखना, यह है एक विधि, और दूसरा है प्वाइन्ट बन प्वाइन्ट को कार्य में लगाना। प्वाइन्ट रूप भी हो और प्वाइन्ट्स भी हों। दोनों का बैलेन्स हो। यह है नम्बरवन विधि से नम्बरवन सिद्धि प्राप्त करना। कभी प्वाइन्ट के विस्तार में चले जाते हो। कभी प्वाइन्ट रूप में टिक जाते हैं। प्वाइन्ट रूप और प्वाइन्ट साथ-साथ चाहिए। कार्य शक्ति को बढ़ाओ। समझा। नम्बरवन आना है तो यह करना पड़ेगा।
आजकल साइन्स की शक्ति, साइन्स के साधनों द्वारा कार्य-शक्ति कितनी तेज कर रही है! जो चैतन्य मनुष्य कार्य कर सकता है, जितने समय और जितना यथार्थ चैतन्य मनुष्य कर सकता है उतना साइन्स के साधन कम्प्युटर कितना जल्दी काम करता है। चैतन्य मनुष्य को भी करेक्शन करता है। तो जब साइन्स के साधन कार्य-शक्ति को तीव्र बना सकते हैं, कई ऐसी इन्वेन्शन निकली भी हैं और निकल भी रही हैं, तो ब्राह्मण आत्माओं की साइलेन्स की शक्ति कितना तीव्र कार्य यथार्थ सफल कर सकती है। सेकेण्ड में निर्णय हो, सेकेण्ड में कार्य को प्रैक्टिकल में सफल करो। सोचना और करना – इसका भी बैलेन्स चाहिए। कई ब्राह्मण आत्माएं सोचती बहुत है, लेकिन करने के समय जितना सोचते हैं उतना करते नहीं हैं और कई फिर करने में लग जाते हैं – सोचते पीछे हैं कि ठीक किया वा नहीं किया? क्या करना है अभी? तो सोचना और करना – दोनों साथ-साथ हो। नहीं तो क्या होता है? सोचते हैं कि यह करना है लेकिन सोच के करेंगे और सोचते सोचते कार्य का समय और परिस्थिति बदल जाती है। फिर कहते हैं करना तो था, सोचा तो था…। जब साइन्स के साधन तीव्र गति के हो रहे हैं, एक सेकेण्ड में क्या नहीं कर लेते हैं! विनाश के साधन तीव्र गति के तरफ जा रहे हैं तो स्थापना के साइलेन्स के शक्तिशाली साधन क्या नहीं कर सकते! अभी तो प्रकृति आप मालिकों का आह्वान कर रही है। आप लोग उनको आर्डर नहीं करते तो प्रकृति कितनी धमाल कर रही है! मालिक तैयार हो जाओ तो प्रकृति आपका स्वागत करे। ऐसे तैयार हो? कि अभी तैयार कर रहे हो? सम्पूर्ण तैयारी की महिमा आपके भक्त लोग अब तक कर रहे हैं। अपनी महिमा को जानते हो? अब चेक करो कि इन सबमें सर्वगुण सम्पन्न भी हो, सम्पूर्ण निर्विकारी भी हो, सम्पूर्ण अहिंसक और मर्यादा पुरुषोत्तम भी हो, 16 कला सम्पन्न भी हो? सभी बातों में फुल है तो समझो मालिक तैयार हैं और इसमें परसेन्टेज है तो मालिक तैयार नहीं। बालक है लेकिन मालिक नहीं बने हैं। तो प्रकृति आप मालिक का स्वागत करेगी। बाप के बालक हैं। वह तो ठीक है। इसमें पास हो। लेकिन इन पांचों ही बातों में सम्पन्न बनना अर्थात् मालिक बनना। प्रकृति को आर्डर करें? अच्छा। तपस्या वर्ष में तो तैयार हो जायेंगे ना? फिर तो आर्डर करें ना? यह तपस्या वर्ष लास्ट चांस है या फिर है और थोड़ा चांस दो। फिर तो नहीं कहेंगे ना! अच्छा।
चारों ओर के सर्व राज्य अधिकारी आत्माओं को, सदा डबल तख्तनशीन विशेष आत्माओं को, सदा सोचना और करना दोनों शक्तियों को समान बनाने वाली वरदानी आत्माओं को, सदा परमात्म प्यार निभाने वाले सच्चे दिल वाले बच्चों को दिलाराम बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
सोच और कर्म में समानता लाना ही परमात्म प्यार निभाना है
स्वराज्य से विश्वराज्य तक की आध्यात्मिक यात्रा
प्रस्तावना
जब आत्मा अपने मन, बुद्धि और संस्कारों पर राज्य करना सीख जाती है, तभी वह सच्चे अर्थों में “स्वराज्य अधिकारी” कहलाती है। यही स्वराज्य आगे चलकर विश्वराज्य का आधार बनता है। आज संसार में हर व्यक्ति दूसरों को बदलना चाहता है, लेकिन स्वयं पर शासन करना नहीं सीखता। इसलिए अशान्ति, तनाव, क्रोध और असन्तोष बढ़ता जा रहा है।
बापदादा इस मुरली में समझाते हैं कि परमात्म प्यार केवल भावनाओं का नाम नहीं है, बल्कि सोच और कर्म में समानता लाना ही सच्चा परमात्म प्यार निभाना है। यदि हम सोचते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं, तो आत्मा शक्तिशाली नहीं बन पाती। लेकिन जब विचार, वाणी और कर्म एक समान हो जाते हैं, तब आत्मा डबल तख्तनशीन बन जाती है।
स्वराज्य अधिकारी कौन?
स्वराज्य अधिकारी वह है जो अपनी कर्मेन्द्रियों, मन और संस्कारों पर नियंत्रण रखता है।
आज मनुष्य छोटी-छोटी परिस्थितियों में भी विचलित हो जाता है। किसी ने कुछ कह दिया तो मन दुखी हो गया, किसी ने अपमान कर दिया तो क्रोध आ गया। इसका अर्थ है कि आत्मा स्वयं की मालिक नहीं बनी है।
बापदादा कहते हैं कि जैसे किसी राज्य का राजा अपने कर्मचारियों को आदेश देता है, वैसे ही आत्मा को अपनी कर्मेन्द्रियों को आदेश देना चाहिए।
मुरली कोटेशन
“मन को आर्डर दिया कि व्यर्थ नहीं सोचो, सेकेण्ड में फुल स्टॉप।”
— अव्यक्त मुरली
यह स्थिति तब आती है जब आत्मा निरन्तर अभ्यास करती है।
रोज अपनी “राज्य दरबार” लगाओ
बापदादा कहते हैं कि हर आत्मा को प्रतिदिन रात को अपनी “राज्य दरबार” लगानी चाहिए। अर्थात् पूरे दिन का आत्मनिरीक्षण करना चाहिए।
- आज मन कहाँ भटका?
- कौन सा संस्कार बार-बार सामने आया?
- किस कर्मेन्द्रिय ने धोखा दिया?
- कहाँ व्यर्थ बोला?
- कहाँ समय नष्ट किया?
यदि गलती को उसी समय चेक करके बदल लिया जाए, तो संस्कार पक्के नहीं होते।
उदाहरण
जैसे कोई डॉक्टर बीमारी को शुरुआती अवस्था में पकड़ ले तो इलाज आसान हो जाता है। लेकिन यदि बीमारी बढ़ जाए तो समय और मेहनत दोनों अधिक लगते हैं।
ठीक वैसे ही, यदि आत्मा शुरुआत में ही क्रोध, आलस्य, ईर्ष्या या व्यर्थ संकल्प को रोक दे, तो परिवर्तन सहज हो जाता है।
केवल “गलत” देखना पर्याप्त नहीं
कई लोग दिनभर स्वयं को दोष देते रहते हैं — “मुझसे गलती हो गई”, “मैं कमजोर हूं”, “मुझमें यह कमी है।”
लेकिन बापदादा कहते हैं कि केवल “रॉन्ग” देखना पर्याप्त नहीं। साथ में “राइट” क्या है, यह भी स्पष्ट होना चाहिए।
मुरली कोटेशन
“सिर्फ यह नहीं सोचो कि यह रांग है, लेकिन राइट क्या है और राइट पर चलने की विधि स्पष्ट हो।”
— अव्यक्त मुरली
सामान्य जीवन का उदाहरण
यदि किसी बच्चे को बार-बार कहा जाए — “गलत मत करो”, लेकिन सही तरीका न बताया जाए, तो वह भ्रमित हो जाएगा।
उसी प्रकार आत्मा को भी केवल दोष नहीं, बल्कि समाधान चाहिए।
सफल राज्य अधिकारी की पहचान
जो आत्मा स्वयं पर शासन करना सीख जाती है, वह दूसरों को भी सन्तुष्ट करती है।
ऐसी आत्मा के लिए लोगों के दिल से स्वतः “वाह-वाह” निकलती है। यह बाहरी प्रशंसा नहीं, बल्कि आत्माओं की दिल से निकली हुई शुभ भावना होती है।
मुरली कोटेशन
“सर्व के दिल से वाह-वाह के गीत बजते रहेंगे।”
— अव्यक्त मुरली
आज संसार में लोग सम्मान पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन आध्यात्मिक जीवन में सम्मान माँगना नहीं पड़ता, वह स्वतः प्राप्त होता है।
डबल तख्तनशीन बनने का रहस्य
बापदादा कहते हैं कि सच्चा राजयोगी “डबल तख्तनशीन” होता है।
दो तख्त कौन से हैं?
- अकाल तख्त — आत्मा की स्थिर और शक्तिशाली स्थिति
- दिल तख्त — बाप के दिल में विशेष स्थान
जो आत्मा हर परिस्थिति में आत्मस्वरूप स्थित रहती है, वही बाप के दिल में स्थान पाती है।
उदाहरण
यदि राजा स्वयं सिंहासन पर न बैठे तो उसके आदेश को कोई नहीं मानेगा।
उसी प्रकार यदि आत्मा स्वयं आत्मस्थिति में नहीं है, तो मन और कर्मेन्द्रियां भी उसके आदेश का पालन नहीं करेंगी।
परमात्म प्यार परिस्थितियों से बड़ा है
आज संसार भय, युद्ध, तनाव और असुरक्षा से घिरा हुआ है। लेकिन बापदादा कहते हैं कि परमात्म प्यार आत्मा को हर परिस्थिति से पार करा देता है।
मुरली कोटेशन
“परमात्म प्यार बुद्धिवान की बुद्धि बन परिस्थिति को श्रेष्ठ स्थिति में बदल लेता है।”
— अव्यक्त मुरली
सामान्य उदाहरण
कई बार जीवन में परिस्थितियाँ इतनी कठिन होती हैं कि रास्ता दिखाई नहीं देता। लेकिन जब आत्मा सच्चे दिल से बाबा को याद करती है, तो असम्भव भी सम्भव हो जाता है।
जैसे एक छोटा बच्चा अपने पिता का हाथ पकड़ ले तो भीड़ में भी सुरक्षित महसूस करता है, वैसे ही परमात्म प्यार आत्मा को निर्भय बना देता है।
सोच और करना — दोनों में बैलेंस
आज बहुत लोग अच्छा सोचते हैं, लेकिन करते नहीं।
कुछ लोग बिना सोचे कार्य कर देते हैं।
बापदादा कहते हैं कि सोच और कर्म दोनों का संतुलन आवश्यक है।
मुरली कोटेशन
“सोचना और करना — दोनों साथ-साथ हो।”
— अव्यक्त मुरली
उदाहरण
कई लोग सोचते हैं —
- रोज योग करेंगे,
- क्रोध नहीं करेंगे,
- सेवा करेंगे,
लेकिन केवल सोचते रहते हैं। दूसरी ओर कुछ लोग बिना समझ के कार्य कर देते हैं और बाद में पछताते हैं।
राजयोगी आत्मा पहले यथार्थ सोचती है, फिर तुरंत श्रेष्ठ कर्म करती है।
साइन्स और साइलेन्स की शक्ति
आज विज्ञान (Science) ने संसार को अत्यन्त तेज बना दिया है। कम्प्यूटर सेकण्ड में हजारों कार्य कर देता है।
लेकिन बापदादा कहते हैं कि साइलेन्स की शक्ति इससे भी अधिक तेज है।
मुरली कोटेशन
“ब्राह्मण आत्माओं की साइलेन्स की शक्ति कितना तीव्र कार्य यथार्थ सफल कर सकती है।”
— अव्यक्त मुरली
जब आत्मा संकल्प शक्ति से भरपूर हो जाती है, तो वह केवल अपने लिए नहीं, बल्कि वातावरण परिवर्तन का भी माध्यम बन जाती है।
प्रकृति मालिकों का इंतजार कर रही है
आज प्रकृति में भूकंप, तूफान, गर्मी, अशान्ति और असंतुलन बढ़ रहा है।
बापदादा कहते हैं कि प्रकृति अपने मालिकों को पुकार रही है। जब आत्माएं सम्पूर्ण बन जाएंगी, तब प्रकृति भी सहयोगी बन जाएगी।
सम्पूर्ण मालिक बनने की पाँच निशानियाँ
- सर्वगुण सम्पन्न
- सम्पूर्ण निर्विकारी
- सम्पूर्ण अहिंसक
- मर्यादा पुरुषोत्तम
- 16 कला सम्पन्न
परमात्म प्यार निभाने का सच्चा अर्थ
प्यार केवल अनुभव करने की चीज नहीं, निभाने की जिम्मेदारी भी है।
बहुत लोग कहते हैं — “हमें बाबा से बहुत प्यार है।”
लेकिन क्या वह प्यार व्यवहार में दिखाई देता है?
यदि आत्मा —
- समय पर योग करे,
- मर्यादाओं का पालन करे,
- व्यर्थ से बचे,
- सेवा में तत्पर रहे,
तो वही सच्चा परमात्म प्यार निभाना है।
मुरली कोटेशन
“प्रीत करना अनेकों को आता है लेकिन निभाना कोई-कोई को आता है।”
— अव्यक्त मुरली
निष्कर्ष
यह सम्पूर्ण मुरली हमें सिखाती है कि सच्चा राजयोग केवल ज्ञान सुनना नहीं, बल्कि स्वयं पर राज्य करना है।
जब आत्मा —
- अपने मन पर नियंत्रण रखती है,
- सोच और कर्म में समानता लाती है,
- परमात्म प्यार को जीवन में उतारती है,
- और हर परिस्थिति में आत्मस्थिति बनाए रखती है,
तब वह आत्मा स्वराज्य अधिकारी बन जाती है। यही स्वराज्य भविष्य के विश्वराज्य का आधार है।
BK Murli References
- अव्यक्त मुरली
- बापदादा मधुबन मिलन
- “सोचना और करना — दोनों साथ-साथ हो।”
- “मन को आर्डर दिया कि व्यर्थ नहीं सोचो, सेकेण्ड में फुल स्टॉप।”
- “प्रीत करना अनेकों को आता है लेकिन निभाना कोई-कोई को आता है।”
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सोच और कर्म में समानता लाना ही परमात्म प्यार निभाना है
स्वराज्य से विश्वराज्य तक की आध्यात्मिक यात्रा
प्रश्नोत्तर (Questions & Answers)
1. प्रश्न: स्वराज्य अधिकारी किसे कहा जाता है?
उत्तर:
स्वराज्य अधिकारी वह आत्मा है जो अपने मन, बुद्धि, संस्कार और कर्मेन्द्रियों पर नियंत्रण रखती है। वह परिस्थितियों या लोगों के प्रभाव में नहीं आती, बल्कि स्वयं की मालिक बनकर रहती है।
बापदादा कहते हैं कि जैसे एक राजा अपने राज्य को नियंत्रित करता है, वैसे ही आत्मा को अपनी इन्द्रियों और संकल्पों पर शासन करना चाहिए।
मुरली पॉइंट:
“मन को आर्डर दिया कि व्यर्थ नहीं सोचो, सेकेण्ड में फुल स्टॉप।”
— अव्यक्त मुरली
2. प्रश्न: आत्मा छोटी-छोटी बातों में क्यों विचलित हो जाती है?
उत्तर:
क्योंकि आत्मा स्वयं पर राज्य करना नहीं सीखती।
जब कोई कुछ कह देता है और हम दुखी हो जाते हैं, या अपमान होने पर क्रोध आ जाता है, तो इसका अर्थ है कि मन और संस्कार हमारे मालिक बन गए हैं।राजयोग का अभ्यास आत्मा को परिस्थितियों से ऊपर उठना सिखाता है।
3. प्रश्न: “राज्य दरबार” लगाने का क्या अर्थ है?
उत्तर:
राज्य दरबार लगाने का अर्थ है प्रतिदिन आत्मनिरीक्षण करना।
दिनभर के कर्मों और संकल्पों को चेक करना कि —- आज मन कहाँ भटका?
- कहाँ व्यर्थ सोचा?
- किस संस्कार ने धोखा दिया?
- कहाँ समय व्यर्थ गया?
यह अभ्यास आत्मा को जागरूक और शक्तिशाली बनाता है।
4. प्रश्न: गलती को तुरंत चेक करना क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
यदि गलती को उसी समय सुधार लिया जाए, तो वह संस्कार नहीं बनती।
लेकिन यदि बार-बार वही गलती दोहराई जाए, तो वह पक्का स्वभाव बन जाती है।उदाहरण:
जैसे बीमारी शुरुआत में पकड़ी जाए तो जल्दी ठीक हो जाती है, वैसे ही क्रोध, आलस्य और ईर्ष्या जैसे दोष शुरुआत में ही रोके जाएँ तो परिवर्तन सहज हो जाता है।
5. प्रश्न: केवल अपनी कमजोरी देखना पर्याप्त क्यों नहीं?
उत्तर:
क्योंकि केवल “मैं गलत हूं” सोचने से परिवर्तन नहीं होता।
साथ में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि सही क्या है और उसे जीवन में कैसे लाना है।मुरली पॉइंट:
“सिर्फ यह नहीं सोचो कि यह रांग है, लेकिन राइट क्या है और राइट पर चलने की विधि स्पष्ट हो।”
— अव्यक्त मुरली
6. प्रश्न: सफल राज्य अधिकारी की पहचान क्या है?
उत्तर:
सफल राज्य अधिकारी आत्मा स्वयं भी सन्तुष्ट रहती है और दूसरों को भी सन्तुष्ट करती है।
ऐसी आत्मा के लिए लोगों के दिल से स्वतः शुभभावनाएँ निकलती हैं।
मुरली पॉइंट:
“सर्व के दिल से वाह-वाह के गीत बजते रहेंगे।”
— अव्यक्त मुरली
7. प्रश्न: “डबल तख्तनशीन” का क्या अर्थ है?
उत्तर:
डबल तख्तनशीन का अर्थ है —
- अकाल तख्तनशीन — आत्मस्वरूप में स्थित रहना
- दिल तख्तनशीन — बाप के दिल में विशेष स्थान पाना
जो आत्मा हर परिस्थिति में स्थिर रहती है, वही दोनों तख्त प्राप्त करती है।
8. प्रश्न: यदि आत्मा आत्मस्थिति में नहीं रहती तो क्या होता है?
उत्तर:
तब मन और कर्मेन्द्रियां आत्मा की बात नहीं मानतीं।
जैसे राजा स्वयं सिंहासन पर न बैठे तो उसके आदेश का प्रभाव नहीं रहता, वैसे ही आत्मस्थिति के बिना आत्मा अपने संकल्पों और इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं रख सकती।
9. प्रश्न: परमात्म प्यार आत्मा को कैसे शक्तिशाली बनाता है?
उत्तर:
परमात्म प्यार आत्मा को भय, तनाव और कठिन परिस्थितियों से पार कराने की शक्ति देता है।
जब आत्मा सच्चे दिल से बाबा को याद करती है, तो असम्भव कार्य भी सहज हो जाते हैं।
मुरली पॉइंट:
“परमात्म प्यार बुद्धिवान की बुद्धि बन परिस्थिति को श्रेष्ठ स्थिति में बदल लेता है।”
— अव्यक्त मुरली
10. प्रश्न: सोच और कर्म में समानता क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
यदि आत्मा सोचती कुछ और है और करती कुछ और है, तो उसकी शक्ति कमजोर हो जाती है।
राजयोगी आत्मा पहले यथार्थ सोचती है और फिर उसी अनुसार कर्म करती है। यही सच्चा परमात्म प्यार निभाना है।
मुरली पॉइंट:
“सोचना और करना — दोनों साथ-साथ हो।”
— अव्यक्त मुरली
11. प्रश्न: केवल अच्छा सोचने से सफलता क्यों नहीं मिलती?
उत्तर:
क्योंकि बिना कर्म के केवल संकल्प अधूरे रह जाते हैं।
बहुत लोग सोचते हैं —
- योग करेंगे,
- क्रोध नहीं करेंगे,
- सेवा करेंगे,
लेकिन यदि उसे व्यवहार में नहीं लाया जाए तो परिवर्तन नहीं होता।
12. प्रश्न: साइन्स और साइलेन्स की शक्ति में क्या अन्तर है?
उत्तर:
साइन्स बाहरी साधनों से कार्य को तेज करती है, लेकिन साइलेन्स आत्मा की आंतरिक शक्ति को जागृत करती है।
बापदादा कहते हैं कि आत्मा की संकल्प शक्ति वातावरण परिवर्तन तक कर सकती है।
मुरली पॉइंट:
“ब्राह्मण आत्माओं की साइलेन्स की शक्ति कितना तीव्र कार्य यथार्थ सफल कर सकती है।”
— अव्यक्त मुरली
13. प्रश्न: प्रकृति आज अशान्त क्यों हो रही है?
उत्तर:
क्योंकि मनुष्य ने प्रकृति पर अधिकार तो किया, लेकिन स्वयं पर अधिकार नहीं किया।
जब आत्माएं सम्पूर्ण और पवित्र बनेंगी, तब प्रकृति भी सहयोगी बन जाएगी।
14. प्रश्न: सम्पूर्ण मालिक बनने की पाँच निशानियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
सम्पूर्ण मालिक बनने की पाँच निशानियाँ हैं —
- सर्वगुण सम्पन्न
- सम्पूर्ण निर्विकारी
- सम्पूर्ण अहिंसक
- मर्यादा पुरुषोत्तम
- 16 कला सम्पन्न
15. प्रश्न: परमात्म प्यार निभाने का सच्चा अर्थ क्या है?
उत्तर:
परमात्म प्यार केवल भावनात्मक अनुभव नहीं, बल्कि जीवन की जिम्मेदारी है।
यदि आत्मा —
- नियमित योग करे,
- मर्यादाओं का पालन करे,
- व्यर्थ से बचे,
- सेवा में तत्पर रहे,
तो वही सच्चा परमात्म प्यार निभाना है।
मुरली पॉइंट:
“प्रीत करना अनेकों को आता है लेकिन निभाना कोई-कोई को आता है।”
— अव्यक्त मुरली
16. प्रश्न: सच्चा राजयोग क्या सिखाता है?
उत्तर:
सच्चा राजयोग केवल ज्ञान सुनना नहीं, बल्कि स्वयं पर राज्य करना सिखाता है।
जब आत्मा —
- मन पर नियंत्रण रखती है,
- सोच और कर्म में समानता लाती है,
- परमात्म प्यार को व्यवहार में उतारती है,
- और हर परिस्थिति में आत्मस्थिति बनाए रखती है,
तब वह स्वराज्य अधिकारी बन जाती है और भविष्य के विश्वराज्य की अधिकारी बनती है।
- Disclaimer
- यह वीडियो/लेख ब्रह्माकुमारीज़ की आध्यात्मिक शिक्षाओं और मुरली पॉइंट्स पर आधारित आध्यात्मिक प्रस्तुति है। इसका उद्देश्य आत्मिक जागृति, सकारात्मक सोच और आध्यात्मिक उन्नति को बढ़ावा देना है। प्रस्तुत विचार व्यक्तिगत आध्यात्मिक अध्ययन एवं समझ पर आधारित हैं।
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