05/03-04-1991 — “Step Beyond All Limitations and Become a Detached One of the Unlimited”

AV-05/03-04-1991-“सर्व हदों से निकल बेहद के वैरागी बनो”

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“सर्व हदों से निकल बेहद के वैरागी बनो”

आज कल्प बाद फिर से मिलन मनाने सभी बच्चे अपने साकारी स्वीट होम मधुबन में पहुँच गये हैं। साकारी वतन का स्वीट होम मधुबन ही है। जहाँ बाप और बच्चों का रूहानी मेला लगता है। मिलन मेला होता है। तो सभी बच्चे मिलन मेले में आये हुए हो। यह बाप और बच्चों का मिलन मेला सिर्फ इस संगमयुग पर और मधुबन में ही होता है। इसलिए सभी भाग कर मधुबन में पहुँचे हो। मधुबन बापदादा का साकार रूप में भी मिलन कराता और साथ-साथ सहज याद द्वारा अव्यक्त मिलन भी कराता है, क्योंकि मधुबन धरनी को रूहानी मिलन की, साकार रूप में मिलन की अनुभूति का वरदान मिला हुआ है। वरदानी धरनी होने के कारण मिलन का अनुभव सहज करते हो। और कोई भी स्थान पर ज्ञान सागर और ज्ञान नदियों का मिलन मेला नहीं होता। सागर और नदियों के मिलन मेले का यह एक ही स्थान है। ऐसे महान वरदानी धरनी पर आये हो – ऐसे समझते हो?

तपस्या वर्ष में विशेष इस कल्प में पहली बार मिलने वाले बच्चों को गोल्डन चांस मिला है। कितने लकी हो! तपस्या के आदि में ही नये बच्चों को एक्स्ट्रा बल मिला है। तो आदि में ही यह एक्स्ट्रा बल आगे के लिए, आगे बढ़ने में सहयोगी बनेगा। इसलिए नये बच्चों को ड्रामा ने भी आगे बढ़ने का सहयोग दिया है। इसलिए यह उल्हना नहीं दे सकेंगे कि हम तो पीछे आये हैं। नहीं, तपस्या वर्ष को भी वरदान मिला हुआ है। तपस्या वर्ष में वरदानी भूमि पर आने का अधिकार मिला है, चांस मिला है। यह एक्स्ट्रा भाग्य कम नहीं है! यह वर्ष का, मधुबन धरनी का और अपने पुरुषार्थ का – तीनों वरदान विशेष आप नये बच्चों को मिले हुए हैं। तो कितने लकी हुए! इतने अविनाशी भाग्य का नशा साथ में रखना। सिर्फ यहाँ तक नशा न रहे, लेकिन अविनाशी बाप है, अविनाशी आप श्रेष्ठ आत्माएं हो, तो भाग्य भी अविनाशी है। अविनाशी भाग्य को अविनाशी रखना। यह सिर्फ सहज अटेन्शन देने की बात है। टेन्शन वाला अटेन्शन नहीं। सहज अटेन्शन हो, और मुश्किल है भी क्या? मेरा बाबा जान लिया, मान लिया। तो जो जान लिया, मान लिया, अनुभव कर लिया, अधिकार प्राप्त हो गया फिर मुश्किल क्या है? सिर्फ एक ही मेरा बाबा – यह अनुभव होता रहे। यही फुल नॉलेज है।

एक “बाबा” शब्द में सारा आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान समाया हुआ है। क्योंकि बीज है ना। बीज में तो सारा झाड़ समाया हुआ होता है ना। विस्तार भूल सकता है लेकिन सार एक बाबा शब्द – यह याद रहना मुश्किल नहीं है। सदा सहज है ना! कभी सहज, कभी मुश्किल नहीं। सदा बाबा मेरा है, कि कभी कभी मेरा है? जब सदा बाबा मेरा है तो याद भी सदा सहज है। कोई मुश्किल बात नहीं। भगवान ने कहा आप मेरे और आपने कहा आप मेरे। फिर क्या मुश्किल है? इसलिए विशेष नये बच्चे और आगे बढ़ो। अभी भी आगे बढ़ने का चांस है। अभी फाइनल समाप्ति का बिगुल नहीं बजा है। इसलिए उड़ो और औरों को भी उड़ाते चलो। इसकी विधि है वेस्ट अर्थात् व्यर्थ को बचाओ। बचत का खाता, जमा का खाता बढ़ाते चलो। क्योंकि 63 जन्म से बचत नहीं की है लेकिन गंवाया है। सभी खाते व्यर्थ गंवा कर खत्म कर दिया है। श्वांस का खजाना भी गंवाया, संकल्प का खजाना भी गंवाया, समय का खजाना भी गंवाया, गुणों का खजाना भी गंवाया, शक्तियों का खजाना भी गंवाया, ज्ञान का खजाना भी गंवाया। कितने खाते खाली हो गये! अभी इन सभी खातों को जमा करना है। जमा होने का समय भी अभी है और जमा करने की विधि भी बाप द्वारा सहज मिल रही है। विनाशी खजाने खर्च करने से कम होते हैं, खुटते हैं और यह सब खजाने जितना स्व के प्रति, और औरों के प्रति शुभ वृत्ति से कार्य में लगायेंगे, उतना जमा होता जायेगा, बढ़ता जायेगा। यहाँ खजानों को कार्य में लगाना, यह जमा की विधि है। वहाँ रखना जमा करने की विधि है और यहाँ लगाना जमा करने की विधि है। फर्क है। समय को स्वयं प्रति या औरों प्रति शुभ कार्य में लगाओ तो जमा होता जायेगा। ज्ञान को कार्य में लगाओ। ऐसे गुणों को, शक्तियों को जितना लगायेंगे उतना बढ़ेगा। यह नहीं सोचना – जैसे वह लॉकर में रख देते हैं और समझते हैं बहुत जमा है, ऐसे आप भी सोचो मेरे बुद्धि में ज्ञान बहुत है, गुण भी मेरे में बहुत हैं, शक्तियां भी बहुत हैं। लॉकप करके नहीं रखो, यूज़ करो। समझा। जमा करने की विधि क्या है? कार्य में लगाना। स्वयं प्रति भी यूज़ करो, नहीं तो लूज़ हो जायेंगे। कई बच्चे कहते हैं कि सर्व खजाने मेरे अन्दर बहुत समाये हुए हैं। लेकिन समाये हुए की निशानी क्या है? समाये हुए हैं अर्थात् जमा है। तो उसकी निशानी है – स्व प्रति व औरों के प्रति समय पर काम में आये। काम में आये ही नहीं और कहे बहुत जमा है, बहुत जमा है। तो इसको यथार्थ जमा की विधि नहीं कहेंगे। इसलिए अगर यथार्थ विधि नहीं होगी तो समय पर सम्पूर्णता की सिद्धि नहीं मिलेगी। धोखा मिल जायेगा। सिद्धि नहीं मिलेगी।

गुणों को, शक्तियों को कार्य में लगाओ तो बढ़ते जायेंगे। तो बचत की विधि, जमा करने की विधि को अपनाओ। फिर व्यर्थ का खाता स्वत: ही परिवर्तन हो सफल हो जायेगा। जैसे भक्ति मार्ग में यह नियम है कि जितना भी आपके पास स्थूल धन है तो उसके लिये कहते हैं – दान करो, सफल करो तो बढ़ता जायेगा। सफल करने के लिए कितना उमंग-उत्साह बढ़ाते हैं, भक्ति में भी। तो आप भी तपस्या वर्ष में सिर्फ यह नहीं चेक करो कि व्यर्थ कितना गंवाया? व्यर्थ गंवाया, वह अलग बात है। लेकिन यह चेक करो कि सफल कितना किया? जो सारे खजाने सुनाये। गुण भी है बाप की देन। मेरा यह गुण है, मेरी शक्ति है – यह स्वप्न में भी गलती नहीं करना। यह बाप की देन है तो प्रभु देन। परमात्म देन को मेरा मानना – यह महापाप है। कई बार कई बच्चे साधारण भाषा में सोचते भी हैं और बोलते भी हैं कि मेरे इस गुण को यूज़ नहीं किया जाता, मेरे में यह शक्ति है, मेरी बुद्धि बहुत अच्छी है, इसको यूज़ नहीं किया जाता है। ‘मेरी’ कहाँ से आई? ‘मेरी’ कहा और मैली हुई। भक्ति में भी यह शिक्षा 63 जन्मों से देते रहे हैं कि मेरा नहीं मानो, तेरा मानो। लेकिन फिर भी माना नहीं। तो ज्ञान मार्ग में भी कहना तेरा और मानना मेरा – यह ठगी यहाँ नहीं चलती। इसलिए प्रभु प्रसाद को अपना मानना – यह अभिमान और अपमान करना है। “बाबा-बाबा” शब्द कहाँ भी भूलो नहीं। बाबा ने शक्ति दी है, बुद्धि दी है, बाबा का कार्य है, बाबा का सेन्टर है, बाबा की सब चीजें है। ऐसे नहीं समझो – मेरा सेन्टर है, हमने बनाया है, हमारा अधिकार है। ‘हमारा’ शब्द कहाँ से आया? आपका है क्या? गठरी सम्भाल कर रखी है क्या? कई बच्चे ऐसा नशा दिखाते हैं – हमने सेन्टर का मकान बनाया है तो हमारा अधिकार है। लेकिन बनाया किसका सेन्टर? बाबा का सेन्टर है ना! तो जब बाबा को अर्पण कर दिया तो फिर आपका कहाँ से आया? मेरा कहाँ से आया? जब बुद्धि बदलती है तो कहते हैं – मेरा है। मेरे-मेरे ने ही मैला किया फिर मैला होना है? जब ब्राह्मण बने तो ब्राह्मण जीवन का बाप से पहला वायदा कौन सा है? नयों ने वायदा किया है, या पुरानों ने किया है? नये भी अभी तो पुराने होकर आये हो ना? निश्चय बुद्धि का फार्म भरकर आये हो ना? तो सबका पहला-पहला वायदा है – तन-मन-धन और बुद्धि सब तेरे। यह वायदा सभी ने किया है?

अभी वायदा करने वाले हो तो हाथ उठाओ। जो समझते हैं कि आइवेल के लिए कुछ तो रखना पड़ेगा। सब कुछ बाप को कैसे दे देंगे? कुछ तो किनारा रखना पड़ेगा। जो समझते हैं कि यह समझदारी का काम है, वह हाथ उठाओ। कुछ किनारे रखा है? देखना, फिर यह नहीं कहना कि हमको किसने देखा? इतनी भीड़ में किसने देखा? बाप के पास तो टी.वी. बहुत क्लीयर है। उससे छिप नहीं सकते हो। इसलिए सोच, समझ करके थोड़ा रखना हो, भल रखो। पाण्डव क्या समझते हो? थोड़ा रखना चाहिए? अच्छी तरह से सोचो। जिनको रखना है वे अभी हाथ उठा ले, बच जायेंगे। नहीं तो यह समय, यह सभा, यह आपका कांध का हिलाना – यह सब दिखाई देगा। कभी भी मेरापन नहीं रखो। बाप कहा और पाप गया। बाप नहीं कहते तो पाप हो जाता है। पाप के वश होते, फिर बुद्धि काम नहीं करती है। कितना भी समझाओ, कहेंगे नहीं, यह तो राइट है। यह तो होना ही है। यह तो करना ही है। बाप को भी रहम पड़ता है। क्योंकि उस समय पाप के वश होते हैं। बाप भूल जाता है तो पाप आ जाता है। और पाप के वश होने के कारण जो बोलते हैं, जो करते हैं वह स्वयं भी नहीं समझते कि हम क्या कर रहे हैं, क्योंकि परवश होते हैं। तो सदा ज्ञान के होश में रहो। पाप के जोश में नहीं आओ। बीच-बीच में यह माया की लहर आती है। आप नये इन बातों से बच करके रहना। मेरा-मेरा में नहीं जाना। थोड़ा पुराने हो जाते हैं तो फिर यह मेरे-मेरे की माया बहुत आती है। मेरा विचार, मेरी बुद्धि ही नहीं है तो मेरा विचार कहाँ से आया? तो समझा, जमा करने की विधि क्या है? कार्य में लगाना। सफल करो, अपने ईश्वरीय संस्कारों को भी सफल करो तो व्यर्थ संस्कार स्वत: ही चले जायेंगे। ईश्वरीय संस्कारों को कार्य में नहीं लगाते हो तो वह लॉकर में रहते और पुराना काम करते रहते। कइयों की यह आदत होती है कि बैंक में या अलमारियों में रखने की। बहुत अच्छे कपड़े होंगे, पैसे होंगे, चीजें होंगी, लेकिन यूज़ फिर भी पुराने करेंगे। पुरानी वस्तु से उन्हों को प्यार होता है और अलमारी की चीजें अलमारी में ही रह जायेगी और वह पुराने से ही चला जायेगा। तो ऐसे नहीं करना – पुराने संस्कार यूज करते रहो और ईश्वरीय संस्कार बुद्धि के लॉकर में रखो। नहीं, कार्य में लगाओ, सफल करो। तो यह चार्ट रखो कि सफल कितना किया? सफल करना माना बचाना या बढ़ाना। मन्सा से सफल करो, वाणी से सफल करो। सम्बन्ध-सम्पर्क से, कर्म से, अपने श्रेष्ठ संग से, अपने अति शक्तिशाली वृत्ति से सफल करो। ऐसे नहीं कि मेरी वृत्ति तो अच्छी रहती है। लेकिन सफल कितना किया? मेरे संस्कार तो है ही शान्त लेकिन सफल कितना किया? कार्य में लगाया? तो यह विधि अपनाने से सम्पूर्णता की सिद्धि सहज अनुभव करते रहेंगे। सफल करना ही सफलता की चाबी है। समझा, क्या करना है? सिर्फ अपने में ही खुश नहीं होते रहो – मैं तो बहुत अच्छी गुणवान हूँ, मैं बहुत अच्छा भाषण कर सकती हूँ, मैं बहुत अच्छा ज्ञानी हूँ, योग भी मेरा बहुत अच्छा है। लेकिन अच्छा है तो यूज़ करो ना। उसको सफल करो। सहज विधि है – कार्य में लगाओ और बढ़ाओ। बिना मेहनत के बढ़ता जायेगा और 21 जन्म आराम से खाना। वहाँ मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।

विशाल महफिल है (ओम् शान्ति भवन का हॉल एकदम फुल भर गया इसलिए कइयों को नीचे मेडिटेशन हॉल, छोटे हॉल में बैठना पड़ा। हॉल छोटा पड़ गया) शास्त्रों में यह आपका जो यादगार है, उसमें भी गायन है – पहले गिलास में पानी डाला, फिर उससे घड़े में डाला, फिर घड़े से तालाब में डाला, तालाब से नदी में डाला। आखरीन कहाँ गया? सागर में। तो यह महफिल पहले हिस्ट्री हाल में लगी, फिर मेडिटेशन हाल में लगी, अभी ओम् शान्ति भवन में लग रही है। अब फिर कहाँ लगेगी? लेकिन इसका मतलब नहीं कि साकार मिलन के बिना अव्यक्त मिलन नहीं मना सकते हो। अव्यक्ति मिलन मनाने का अभ्यास समय प्रमाण बढ़ना ही है और बढ़ाना ही है। यह तो दादियों ने रहमदिल होकर आप सबके ऊपर विशेष रहम किया है, नयों के ऊपर। लेकिन अव्यक्त अनुभव को बढ़ाना – यह समय और कार्य में आयेगा। देखो, नये-नये बच्चों के लिए ही बापदादा विशेष यह साकार में मिलन का पार्ट अब तक बजा रहे हैं। लेकिन यह भी कब तक?

सभी खुशराजी हो, सन्तुष्ट हो? बाहर रहने में भी सन्तुष्ट हो? यह भी ड्रामा में पार्ट है। जब कहते हो सारा आबू हमारा होगा, तो वह कैसे होगा? पहले आप चरण तो रखो। फिर अभी जो धर्मशाला नाम है वह अपना हो जायेगा। देखो, विदेश में अभी ऐसे होने लगा है। चर्च इतने नहीं चलते हैं तो बी.के. को दे दी है। जो ऐसे बड़े-बड़े स्थान है, चल नहीं पाते हैं तो ऑफर करते हैं ना। तो ब्राह्मणों के चरण पड़ रहे हैं जगह-जगह पर, इसमें भी राज़ है। ब्राह्मणों को रहने का ड्रामा में पार्ट मिला है। तो सारा ही अपना जब हो जायेगा फिर क्या करेंगे? आपे ही ऑफर करेंगे आप सम्भालो। हमें भी सम्भालो, आश्रम भी सम्भालो। जिस समय जो पार्ट मिलता है, उसमें राजी रह करके पार्ट बजाओ। अच्छा।

मधुबन निवासी और टीचर्स सभी नीचे सुन रहे हैं। सुनने द्वारा मिल रहे हैं। टीचर्स और मधुबन निवासियों को सेवा का प्रत्यक्षफल सबके सन्तुष्टता की दुवाएं मिलती है। यह ब्राह्मण आत्माओं की या बाप की दुवाएं एक्स्ट्रा लिफ्ट के रूप में काम में आती हैं। यह ब्राह्मण आत्माओं के दिल की दुवाएं कम नहीं है। अच्छा!

चारों ओर के सर्व मिलन मनाने के, ज्ञान रतन धारण करने के चात्रक आत्माओं को आकार रूप में वा साकार रूप में मिलन मेला मनाने वाली श्रेष्ठ आत्माओं को, सदा सर्व खजानों को सफल कर सफलता स्वरूप बनने वाली आत्माओं को, सदा मेरा बाबा और कोई हद का मेरापन अंशमात्र भी न रखने वाले ऐसे बेहद के वैरागी आत्माओं को सदा हर समय विधि द्वारा सम्पूर्णता की सिद्धि प्राप्त करने वाले बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

दादियों से:- सदैव कोई नई सीन होनी चाहिए ना। यह भी ड्रामा में नई सीन थी जो रिपीट हुई। यह सोचा था कि यह हॉल भी छोटा हो जायेगा? सदा एक सीन तो अच्छी लगती नहीं। कभी-कभी की सीन अच्छी लगती है। यह भी एक रूहानी रौनक है ना! इन सभी आत्माओं का संकल्प पूरा होना था, इसलिए यह सीन हो गई। यहाँ से छुट्टी दे दी – भले आओ। तो क्या करेंगे? अभी तो नये और बढ़ने हैं। और पुराने तो पुराने हो गये। जैसे उमंग से आये हैं वैसे अपने को सेट किया है, यह अच्छा किया है। विशाल तो होना ही है। कम तो होना है ही नहीं। जब विश्व कल्याणकारी का टाइटल है तो विश्व के आगे यह तो कुछ भी नहीं हैं। वृद्धि भी होनी है और विधि भी नये से नई होनी है। कुछ न कुछ तो विधि होती रहनी है। अभी वृत्ति पॉवरफुल होगी। तपस्या द्वारा वृत्ति पॉवरफुल हो जायेगी तो स्वत: ही वृत्ति द्वारा आत्माओं की भी वृत्ति चेंज होगी। अच्छा, आप सब सेवा करते थकते तो नहीं हो ना। मौज में आ रहे हो। मौज ही मौज है। अच्छा।

पार्टियों से:- सदा अपने को एकरस स्थिति में अनुभव करते हो? एकरस स्थिति है या और हद के रस आकर्षित करते हैं? निरन्तर योगी बन गये? सदा पावरफुल योग है या फर्क पड़ता है? निरन्तर अर्थात् अन्तर न हो। ऐसे शक्तिशाली बने हो या बन रहे हो? कितने तक बने हो? 75 प्रतिशत तक पहुँचे हो? क्योंकि सदा एकरस का अर्थ ही है एक के साथ सदा जैसे बाप, वैसे मैं, बाप समान। बनना तो बाप समान है। बाप तो शक्ति भरते ही हैं। रोज की मुरली क्या है? शक्ति भरती है ना! लेकिन भरने वाले भरते हैं। सदैव स्मृति रखो कि हम महावीर हैं, शिवशक्तियां हैं तो कभी भी निर्बल नहीं होंगे, कमजोर नहीं होंगे। क्योंकि कोई भी विघ्न तब आता है जब कमजोर बनते हैं। अगर कमजोर नहीं बनो तो विघ्न नहीं आ सकता। महावीर को कहते हैं विघ्न विनाशक। तो यह किसका टाइटल है? आप सभी विघ्न विनाशक हो या विघ्नों में घबराने वाले हो? कोई भी शक्ति की कमी हुई तो मास्टर सर्व शक्तिवान नहीं कहेंगे। इसलिए सदा याद रखो कि सर्व शक्तियां बाप का वर्सा है। वर्सा तो पूरा मिला है या थोड़ा मिला है? तो एक भी शक्ति कम नहीं होनी चाहिए। इस समय सभी मधुबन निवासी हो ना! अभी मधुबन को साथ ले जाना। क्योंकि मधुबन अर्थात् मधुरता। मधुबन आपके साथ होगा तो सदा ही सम्पूर्ण और सदा ही सन्तुष्ट रहेंगे। ऐसे नहीं कहना कि मधुबन में तो बहुत अच्छा था। अभी बदल गये। मधुबन का बाबा भी साथ है। तो मधुबन की विशेषता भी साथ है। तो सदा अपने को मास्टर सर्व शक्तिवान अनुभव करेंगे। सभी तीव्र पुरुषार्थी हो या पुरुषार्थी हो? तीव्र पुरुषार्थी की निशानी क्या होती है? तीव्र पुरुषार्थी सदा उड़ती कला वाला होगा, सदा डबल लाइट होगा। कभी ऊपर, कभी नीचे नहीं, सदा उड़ती कला। जितना-जितना विचित्र बाप से प्यार है तो जिससे प्यार होता है वैसा ही बनना होता है। स्वयं भी विचित्र आत्मा रूप में स्थित होंगे तो उड़ती कला में रहेंगे। अच्छा।

(बापदादा का मधुर याद पत्र डबल विदेशी भाई-बहनों प्रति)

चारों ओर के डबल विदेशी बच्चों को बापदादा दिलवर की दिल से बहुत-बहुत यादप्यार स्वीकार हो।

सर्व बच्चों की मधुबन के रिफ्रेशमेन्ट के उमंग-उत्साह की खुशबू पत्रों द्वारा, रूहरिहान द्वारा बाप के पास पहुँच रही है। बापदादा भी बच्चों का तीव्र पुरुषार्थ देख खुश हो रहे हैं और सदा आगे उड़ाने में साथी है। ईश्वरीय परिवार के भी सहयोग की दुवाएं सदा सबके साथ हैं। देखो, मीठे बच्चे इस तपस्या वर्ष में लगन की अग्नि द्वारा सर्व व्यर्थ संकल्प, समय और संस्कारों को समाप्त कर समर्थ-सम्पन्न बनने का जो दृढ़ संकल्प किया है, उनको अपनी हिम्मत और बाप की मदद से पूरा करना ही है और होना ही है। इसके लिए सदा बाप को अपने कम्पेनियन के रूप में साथ रखना और कम्पनी तीव्र पुरुषार्थी फॉलो फादर ब्राह्मण आत्माओं की करनी है। इसमें ही सहज सफलता अनुभव करते रहेंगे। डबल विदेशी बच्चों पर तो विशेष बाप का प्यार है क्योंकि बच्चे भी बाप के लव में लीन रहते हैं। उड़ते रहो और उड़ाते रहो। अच्छा।

(6-4-91 को खास दादी जी तथा दादी जानकी जी से मिलने दीदी के कमरे में बापदादा पधारे)

कर्मातीत स्थिति के समीप आ रहे हैं। कर्म भी वृद्धि को प्राप्त होता रहता है। लेकिन कर्मातीत अर्थात् कर्म के किसी भी बंधन के स्पर्श से न्यारे। ऐसा ही अनुभव बढ़ता रहे। जैसे मुझ आत्मा ने इस शरीर द्वारा कर्म किया ना, ऐसे न्यारापन रहे। न कार्य के स्पर्श करने का और करने के बाद जो रिजल्ट हुई – उस फल को प्राप्त करने में भी न्यारापन। कर्म का फल अर्थात् जो रिजल्ट निकलती है उसका भी स्पर्श न हो, बिल्कुल ही न्यारापन अनुभव होता रहे। जैसेकि दूसरे कोई ने कराया और मैंने किया। किसी ने कराया और मैं निमित्त बनी। लेकिन निमित्त बनने में भी न्यारापन। ऐसी कर्मातीत स्थिति बढ़ती जाती है – ऐसा फील होता है?

महारथियों की स्थिति औरों से न्यारी और प्यारी स्पष्ट हो रही है ना। जैसे ब्रह्मा बाप स्पष्ट थे, ऐसे नम्बरवार आप निमित्त आत्माएं भी साकार स्वरूप से स्पष्ट होती जातीं। कर्मातीत अर्थात् न्यारा और प्यारा। कर्म दूसरे भी करते हैं और आप भी करते हो लेकिन आपके कर्म करने में अन्तर है। स्थिति में अन्तर है। जो कुछ बीता और न्यारा बन गया। कर्म किया और वह करने के बाद ऐसा अनुभव होगा जैसे कि कुछ किया नहीं। कराने वाले ने करा लिया। ऐसी स्थिति का अनुभव करते रहेंगे। हल्कापन रहेगा। कर्म करते भी तन का भी हल्कापन, मन की स्थिति में भी हल्कापन। कर्म की रिजल्ट मन को खैंच लेती है। ऐसी स्थिति है? जितना ही कार्य बढ़ता जायेगा उतना ही हल्कापन भी बढ़ता जायेगा। कर्म अपनी तरफ आकर्षित नहीं करेगा लेकिन मालिक होकर कर्म कराने वाला करा रहा है और निमित्त करने वाले निमित्त बनकर कर रहे हैं।

आत्मा के हल्केपन की निशानी है – आत्मा की जो विशेष शक्तियां हैं मन, बुद्धि, संस्कार, यह तीनों ही ऐसी हल्की होती जायेगी। संकल्प भी बिल्कुल ही हल्की स्थिति का अनुभव करायेंगे। बुद्धि की निर्णय शक्ति भी ऐसा निर्णय करेगी जैसे कि कुछ किया ही नहीं, और कोई भी संस्कार अपनी तरफ आकर्षित नहीं करेगा। जैसे बाप के संस्कार कार्य कर रहे हैं। यह मन-बुद्धि-संस्कार, सूक्ष्म शक्तियां जो हैं, तीनों में लाइट (हल्का), अनुभव करेंगे। स्वत: ही सबके दिल से, मुख से यही निकलता रहेगा कि जैसे बाप, वैसे बच्चे न्यारे और प्यारे हैं। क्योंकि समय प्रमाण बाहर का वातावरण दिन प्रतिदिन और ही भारी होता जायेगा। जितना ही बाहर का वातावरण भारी होगा उतना ही अनन्य बच्चों के संकल्प, कर्म, सम्बन्ध लाइट (हल्के) होते जायेंगे और इस लाइटनेस के कारण सारा कार्य लाइट चलता रहेगा। वायुमण्डल तो तमोप्रधान होने के कारण और भिन्न-भिन्न प्रकार से भारीपन का अनुभव करेंगे। प्रकृति का भी भारीपन होगा। मनुष्यात्माओं की वृत्तियों का भी भारीपन होगा। इसके लिए भी बहुत हल्कापन भी औरों को भी हल्का करेगा। अच्छा, सब ठीक चल रहा है ना। कारोबार का प्रभाव आप लोग के ऊपर नहीं पड़ता। लेकिन आपका प्रभाव कारोबार पर पड़ता है। जो कुछ भी करते हो, सुनते हो तो आपके हल्केपन की स्थिति का प्रभाव कार्य पर पड़ता है। कार्य की हलचल का प्रभाव आप लोगों के ऊपर नहीं आता। अचल स्थिति कार्य को भी अचल बना देती है। सब रीति से असम्भव कार्य सम्भव और सहज हो रहे हैं और होते रहेंगे।

सर्व हदों से निकल बेहद के वैरागी बनो

मधुबन मिलन मेला और बेहद वैराग्य का गहन रहस्य

प्रस्तावना

संगमयुग का समय आत्माओं के लिए सबसे महान और सौभाग्यशाली समय है। यह वही पावन समय है जब स्वयं परमपिता शिव बाबा अपने बच्चों से मिलने साकार और अव्यक्त दोनों रूपों में आते हैं। मधुबन केवल एक स्थान नहीं, बल्कि आत्माओं का “रूहानी स्वीट होम” है जहाँ आत्मा अपने परमपिता से मिलन का अनुभव करती है।

बापदादा कहते हैं —

“सर्व हदों से निकल बेहद के वैरागी बनो।”

इसका अर्थ संसार छोड़ना नहीं, बल्कि “मेरा-पन” छोड़ना है। देह, संबंध, पद, प्रतिष्ठा, सेवा, गुण, शक्ति — सब कुछ बाबा का है, मैं केवल निमित्त आत्मा हूँ।


1. मधुबन — आत्माओं का रूहानी स्वीट होम

मधुबन वह वरदानी धरनी है जहाँ आत्मा को साकार और अव्यक्त दोनों मिलन की अनुभूति होती है। संसार में अनेक मेले लगते हैं, लेकिन “बाप और बच्चों का मिलन मेला” केवल संगमयुग और मधुबन में ही होता है।

मुरली कोटेशन

“मधुबन धरनी को रूहानी मिलन की अनुभूति का वरदान मिला हुआ है।”

सरल उदाहरण

जैसे कोई बच्चा वर्षों बाद अपने घर लौटता है तो उसके मन को शांति और अपनापन मिलता है, वैसे ही आत्मा मधुबन में आकर अपने वास्तविक घर और परिवार का अनुभव करती है।


2. तपस्या वर्ष — विशेष गोल्डन चांस

बापदादा ने विशेष रूप से नए बच्चों को “गोल्डन चांस” कहा। क्योंकि तपस्या वर्ष में मधुबन आना आत्मा को अतिरिक्त बल देता है।

मुरली कोटेशन (06-04-1991)

“तपस्या वर्ष में वरदानी भूमि पर आने का अधिकार मिला है — यह एक्स्ट्रा भाग्य कम नहीं है।”

इसका गहरा अर्थ

सिर्फ मधुबन आना पर्याप्त नहीं, बल्कि यहाँ से ऐसी शक्ति लेकर जाना है जो जीवनभर आत्मा को आगे बढ़ाती रहे।

जीवन में कैसे अपनाएँ?

  • रोज़ थोड़े समय के लिए बाबा की याद में बैठें
  • “मेरा बाबा” का अनुभव करें
  • हर कार्य से पहले बाबा को साथी बनायें

3. “मेरा बाबा” — सम्पूर्ण ज्ञान का सार

बापदादा ने कहा कि सम्पूर्ण ज्ञान का सार केवल एक शब्द में समाया है — “बाबा”।

मुरली कोटेशन

“एक ‘बाबा’ शब्द में सारा आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान समाया हुआ है।”

इसका रहस्य

जैसे बीज में पूरा वृक्ष समाया होता है, वैसे ही “बाबा” शब्द में सम्पूर्ण गीता ज्ञान समाया हुआ है।

सामान्य व्यक्ति के लिए उदाहरण

जब कोई व्यक्ति तनाव में होता है और उसे किसी अपने का सहारा मिलता है, तो उसका मन हल्का हो जाता है। उसी प्रकार “मेरा बाबा” का अनुभव आत्मा को सुरक्षा और शांति देता है।


4. व्यर्थ को बचाओ — जमा का खाता बढ़ाओ

63 जन्मों से आत्मा ने समय, संकल्प, शक्ति और गुणों को व्यर्थ गंवाया है। अब संगमयुग में उन्हें जमा करना है।

कौन-कौन से खजाने?

  • समय
  • संकल्प
  • श्वांस
  • गुण
  • शक्तियाँ
  • ज्ञान

मुरली कोटेशन

“यहाँ खजानों को कार्य में लगाना — यही जमा करने की विधि है।”


5. गुणों और शक्तियों को लॉक मत करो

कई आत्माएँ सोचती हैं —
“मेरे अंदर बहुत ज्ञान है…”
“मेरे पास बहुत शक्तियाँ हैं…”

लेकिन यदि वे उपयोग में नहीं आतीं तो उनका लाभ नहीं।

सरल उदाहरण

जैसे कोई व्यक्ति अलमारी में नए कपड़े रखता रहे और हमेशा पुराने कपड़े ही पहनता रहे, वैसे ही आत्मा भी यदि पुराने संस्कारों का उपयोग करती रहे और ईश्वरीय गुणों को केवल बुद्धि में रखे, तो परिवर्तन नहीं होगा।

क्या करना है?

  • ज्ञान को सेवा में लगाओ
  • शक्तियों को दूसरों के सहयोग में लगाओ
  • मधुर वाणी से आत्माओं को खुशी दो
  • शुभ भावना से वातावरण बदलो

6. “मेरा” शब्द ही माया का द्वार है

बापदादा ने बहुत गहराई से समझाया कि “मेरा” शब्द ही मैलापन लाता है।

मुरली कोटेशन

“‘मेरी’ कहा और मैली हुई।”

इसका अर्थ

  • मेरा सेंटर
  • मेरी सेवा
  • मेरी बुद्धि
  • मेरा विचार

यह सब देह-अभिमान के सूक्ष्म रूप हैं।

वास्तविकता क्या है?

सब कुछ बाबा का है —

  • बुद्धि बाबा की
  • शक्ति बाबा की
  • सेवा बाबा की
  • सेंटर बाबा का

मैं केवल निमित्त आत्मा हूँ।


7. बेहद वैराग्य क्या है?

बेहद वैराग्य का अर्थ संसार छोड़ना नहीं, बल्कि “हद के आकर्षण” से ऊपर उठना है।

हद क्या है?

  • मेरा परिवार
  • मेरा नाम
  • मेरी प्रशंसा
  • मेरी मान्यता
  • मेरा अधिकार

बेहद क्या है?

  • सम्पूर्ण विश्व परिवार
  • सब आत्माओं के प्रति शुभ भावना
  • परमात्मा का साथी बनकर कर्म करना

मुरली कोटेशन

“बाप कहा और पाप गया।”


8. सफल करना ही सफलता की चाबी है

मुरली कोटेशन

“सफल करना ही सफलता की चाबी है।”

कैसे सफल करें?

  • मन्सा से शुभ भावना
  • वाणी से मधुरता
  • कर्म से सेवा
  • संग से प्रेरणा
  • दृष्टि से शक्तिशाली वाइब्रेशन

सरल उदाहरण

यदि किसी के पास धन हो और वह केवल जमा करता रहे लेकिन उपयोग न करे, तो उसका लाभ सीमित रहेगा। लेकिन यदि वही धन सेवा में लगे तो अनेक लोगों का कल्याण होगा।


9. तीव्र पुरुषार्थी की पहचान

बापदादा ने पूछा —
“तीव्र पुरुषार्थी हो या सिर्फ पुरुषार्थी?”

तीव्र पुरुषार्थी की निशानी

  • सदा उड़ती कला
  • डबल लाइट स्थिति
  • निरन्तर योग
  • विघ्नों से न घबराना
  • बाप समान बनना

मुरली कोटेशन

“महावीर को कहते हैं विघ्न विनाशक।”


10. कर्मातीत स्थिति का गहन रहस्य

कर्म करना लेकिन कर्म के बंधन में न फँसना — यही कर्मातीत अवस्था है।

मुरली कोटेशन (06-04-1991)

“कर्म किया और ऐसा अनुभव हो जैसे कुछ किया ही नहीं।”

इसका अर्थ

  • मैं नहीं, बाबा करा रहे हैं
  • मैं केवल निमित्त हूँ
  • फल की इच्छा नहीं
  • सेवा में हल्कापन

सामान्य उदाहरण

जैसे कोई सच्चा सेवाधारी सेवा करके तुरंत भूल जाता है कि उसने क्या किया, वैसे ही कर्मातीत आत्मा कर्म करके हल्की रहती है।


11. मधुबन को साथ ले जाना

बापदादा ने कहा —
मधुबन केवल स्थान नहीं, “मधुरता” है।

इसका अभ्यास

  • घर में मधुरता
  • संबंधों में मधुरता
  • वाणी में मधुरता
  • दृष्टि में मधुरता

तभी हर स्थान मधुबन बन जायेगा।


निष्कर्ष

“सर्व हदों से निकल बेहद के वैरागी बनो” — यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्राह्मण जीवन का सार है।

जब आत्मा —

  • “मेरा” छोड़कर “तेरा” में आती है,
  • गुणों और शक्तियों को सफल करती है,
  • स्वयं को निमित्त समझती है,
  • और हर कार्य बाबा के साथी बनकर करती है,

तब वह सहज ही सम्पूर्णता और कर्मातीत अवस्था की ओर बढ़ती जाती है।

सर्व हदों से निकल बेहद के वैरागी बनो

मधुबन मिलन मेला और बेहद वैराग्य का गहन रहस्य

प्रश्नोत्तर (Questions & Answers)


1. प्रश्न: संगमयुग आत्माओं के लिए सबसे महान समय क्यों कहा जाता है?

उत्तर:

संगमयुग वह पावन समय है जब स्वयं परमपिता शिव बाबा आत्माओं से मिलने आते हैं। इसी समय आत्मा अपने सच्चे स्वरूप, परमधाम और परमात्मा को पहचानती है। यह समय आत्मिक जागृति और जीवन परिवर्तन का समय है।

मुरली पॉइंट:

“सर्व हदों से निकल बेहद के वैरागी बनो।”


2. प्रश्न: मधुबन को “रूहानी स्वीट होम” क्यों कहा जाता है?

उत्तर:

मधुबन वह वरदानी स्थान है जहाँ आत्मा को साकार और अव्यक्त दोनों रूपों में बाबा के मिलन की अनुभूति होती है। यहाँ आत्मा अपने ईश्वरीय परिवार और परमपिता का निकट अनुभव करती है।

उदाहरण:

जैसे कोई बच्चा लंबे समय बाद अपने घर पहुँचकर शांति अनुभव करता है, वैसे ही आत्मा मधुबन में आत्मिक सुख अनुभव करती है।


3. प्रश्न: तपस्या वर्ष को “गोल्डन चांस” क्यों कहा गया है?

उत्तर:

तपस्या वर्ष आत्मा को अतिरिक्त योगबल और पुरुषार्थ की शक्ति देता है। इस समय किया गया पुरुषार्थ आत्मा को तीव्र गति से आगे बढ़ाता है।

मुरली कोटेशन (06-04-1991):

“तपस्या वर्ष में वरदानी भूमि पर आने का अधिकार मिला है — यह एक्स्ट्रा भाग्य कम नहीं है।”


4. प्रश्न: “मेरा बाबा” कहना इतना शक्तिशाली क्यों है?

उत्तर:

“मेरा बाबा” का अनुभव आत्मा को सुरक्षा, प्रेम और शक्ति देता है। यह शब्द आत्मा को परमात्मा से जोड़ देता है।

मुरली कोटेशन:

“एक ‘बाबा’ शब्द में सारा आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान समाया हुआ है।”

उदाहरण:

जैसे संकट में अपने किसी प्रिय का साथ मिल जाए तो मन हल्का हो जाता है, वैसे ही “मेरा बाबा” आत्मा को निश्चिंत बना देता है।


5. प्रश्न: आत्मा ने कौन-कौन से खजाने व्यर्थ गंवाए हैं?

उत्तर:

63 जन्मों से आत्मा ने अनेक खजाने व्यर्थ गंवाए हैं:

  • समय
  • संकल्प
  • श्वांस
  • गुण
  • शक्तियाँ
  • ज्ञान

अब संगमयुग में इन सभी को जमा करना है।

मुरली कोटेशन:

“यहाँ खजानों को कार्य में लगाना — यही जमा करने की विधि है।”


6. प्रश्न: गुणों और शक्तियों को “लॉक” करने का क्या अर्थ है?

उत्तर:

जब आत्मा अपने गुणों और शक्तियों का उपयोग नहीं करती, केवल सोचती रहती है कि “मेरे अंदर बहुत ज्ञान है”, तो वह गुण लॉक हो जाते हैं।

उदाहरण:

जैसे अलमारी में नए कपड़े रखे रहें और व्यक्ति पुराने कपड़े ही पहनता रहे, वैसे ही आत्मा पुराने संस्कारों का उपयोग करती रहती है।

क्या करना चाहिए?

  • ज्ञान को सेवा में लगाओ
  • शक्तियों से सहयोग दो
  • शुभ भावना फैलाओ

7. प्रश्न: “मेरा” शब्द माया का द्वार कैसे बनता है?

उत्तर:

जब आत्मा कहती है —

  • मेरी सेवा
  • मेरा सेंटर
  • मेरी बुद्धि

तब देह-अभिमान प्रवेश करता है।

मुरली कोटेशन:

“‘मेरी’ कहा और मैली हुई।”

वास्तविकता:

सब कुछ बाबा का है। आत्मा केवल निमित्त है।


8. प्रश्न: बेहद वैराग्य का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर:

बेहद वैराग्य का अर्थ संसार छोड़ना नहीं, बल्कि “हद के आकर्षण” से ऊपर उठना है।

हद क्या है?

  • मेरा परिवार
  • मेरा नाम
  • मेरा अधिकार

बेहद क्या है?

  • विश्व परिवार की भावना
  • सबके प्रति शुभ भावना
  • बाबा का साथी बनकर कर्म करना

मुरली कोटेशन:

“बाप कहा और पाप गया।”


9. प्रश्न: सफलता की सच्ची चाबी क्या है?

उत्तर:

बापदादा ने कहा —

“सफल करना ही सफलता की चाबी है।”

सफल कैसे करें?

  • मन्सा से शुभ भावना
  • वाणी से मधुरता
  • कर्म से सेवा
  • दृष्टि से शक्तिशाली वाइब्रेशन

उदाहरण:

जैसे धन सेवा में लगाने से बढ़ता है, वैसे ही गुण और शक्तियाँ उपयोग करने से बढ़ती हैं।


10. प्रश्न: तीव्र पुरुषार्थी आत्मा की पहचान क्या है?

उत्तर:

तीव्र पुरुषार्थी आत्मा:

  • सदा उड़ती कला में रहती है
  • निरन्तर योगी होती है
  • विघ्नों से नहीं घबराती
  • बाप समान बनने का पुरुषार्थ करती है

मुरली कोटेशन:

“महावीर को कहते हैं विघ्न विनाशक।”


11. प्रश्न: कर्मातीत अवस्था क्या है?

उत्तर:

कर्म करना लेकिन कर्म के बंधन में न फँसना — यही कर्मातीत अवस्था है।

मुरली कोटेशन (06-04-1991):

“कर्म किया और ऐसा अनुभव हो जैसे कुछ किया ही नहीं।”

इसका अर्थ:

  • मैं नहीं, बाबा करा रहे हैं
  • मैं निमित्त आत्मा हूँ
  • सेवा में हल्कापन

12. प्रश्न: कर्मातीत आत्मा की पहचान क्या होती है?

उत्तर:

कर्मातीत आत्मा:

  • कर्म करके हल्की रहती है
  • फल की इच्छा नहीं रखती
  • हर कार्य बाबा को समर्पित करती है

उदाहरण:

जैसे सच्चा सेवाधारी सेवा करके भूल जाता है कि उसने क्या किया, वैसे ही कर्मातीत आत्मा कर्म करके न्यारी रहती है।


13. प्रश्न: “मधुबन को साथ ले जाना” का क्या अर्थ है?

उत्तर:

मधुबन केवल स्थान नहीं, बल्कि “मधुरता” की स्थिति है।

जीवन में कैसे अपनाएँ?

  • घर में मधुरता
  • संबंधों में मधुरता
  • वाणी में मधुरता
  • दृष्टि में मधुरता

तब हर स्थान मधुबन बन जाएगा।


14. प्रश्न: “मेरा” से “तेरा” में आने से क्या परिवर्तन होता है?

उत्तर:

जब आत्मा “मेरा” छोड़कर “तेरा” में आती है, तब:

  • अहंकार समाप्त होता है
  • मन हल्का होता है
  • सेवा सफल होती है
  • योग सहज हो जाता है

15. प्रश्न: सम्पूर्णता की ओर बढ़ने की सहज विधि क्या है?

उत्तर:

  • हर कार्य बाबा के साथी बनकर करना
  • गुणों और शक्तियों को सफल करना
  • स्वयं को निमित्त समझना
  • निरन्तर “मेरा बाबा” की स्मृति रखना

यही सहज विधि आत्मा को कर्मातीत और सम्पूर्ण अवस्था तक पहुँचाती है।


निष्कर्ष

“सर्व हदों से निकल बेहद के वैरागी बनो” — यह ब्राह्मण जीवन का सार है।

जब आत्मा:

  • मेरा-पन छोड़ देती है,
  • बाबा को अपना साथी बना लेती है,
  • गुणों और शक्तियों को सेवा में लगाती है,
  • और हर कर्म में निमित्त भाव रखती है,

तब वह सहज ही सम्पूर्णता, हल्केपन और कर्मातीत अवस्था का अनुभव करने लगती है।

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