Awyakt murli 1984

Awyakt murli 1984

S. No.अव्यक्त मुरली 1984वीडियो पाठ प्रश्न और उत्तर के साथ
1(01)“सदा समर्थ सोचो तथा वर्णन करो”
2(02)"14-01-1984 “डबल सेवाधारी स्वत: ही मायाजीत”
3(03)“‘स्वराज्य’ - आपका बर्थ राईट है”
4(04)“18 जनवरी - स्मृति दिवस का महत्व”
5(05)“महादानी बनो, वरदानी बनो”
6(06)“नामीग्रामी सेवाधारी बनने की विधि”
7(07)“अशान्ति का कारण अप्राप्ति और अप्राप्ति का कारण अपवित्रता है”
8(08)18-02-1984 “ब्राह्मण जीवन - अमूल्य जीवन”
9(09)“एक सर्वश्रेष्ठ, महान और सुहावनी घड़ी”
10(10)22-02-1984“संगम पर चार कम्बाइन्ड रूपों का अनुभव”
11(11)"ब्राह्मण जन्म - अवतरित जन्म”
12(12) 26-02-1984 “बापदादा की अद्भुत चित्रशाला”
13(13) 28-02-1984 “बिन्दु और बूंद का रहस्य”
14(14) 01-03-1984 “एक का हिसाब”
15(15) "03-03-1984 “स्व अधिकारियों के स्व के राज्य का हालचाल”
16(16) 05-03-1984 “शान्ति की शक्ति का महत्व”
17(17)"07-03-1984 “कर्मातीत, वानप्रस्थी आत्मायें ही तीव्रगति की सेवा के निमित्त”
18(18)"09-03-1984 “परिवर्तन को अविनाशी बनाओ”
19(19)"12-03-1984 “सन्तुष्टता”
20(20)15-03-1984 “होली उत्सव - पवित्र बनने, बनाने का यादगार”
21(21)02-04-1984 “बिन्दु का महत्व”
22(22)04-04-1984 “संगमयुग की श्रेष्ठ वेला, श्रेष्ठ तकदीर की तस्वीर बनाने की वेला”
23(23)"08-04-1984 “संगमयुग पर प्राप्त अधिकारों से विश्व राज्य अधिकारी”
24(24)10-04-1984 “प्रभु प्यार - ब्राह्मण जीवन का आधार”
25(25)12-04-1984 “ब्राह्मण जीवन का फाउण्डेशन - पवित्रता”
26(26)115-04-1984 “स्नेही, सहयोगी, शक्तिशाली बच्चों की तीन अवस्थाएं”
27(27)17-04-1984 “पद्मापद्म भाग्यशाली की निशानी”
28(28)19-04-1984 “भावुक आत्मा तथा ज्ञानी आत्मा के लक्षण”
29(29)22-04-1984 “विचित्र बाप द्वारा विचित्र पढ़ाई तथा विचित्र प्राप्ति”
30(30)"24-04-1984 “वर्तमान ब्राह्मण जन्म - हीरे तुल्य”
31(31)26-04-1984 “रुहानी विचित्र मेले में सर्व खज़ानों की प्राप्ति”
32(32)29-04-1984 “ज्ञान सूर्य के रुहानी सितारों की भिन्न-भिन्न विशेषताएं”
33(33)01-05-1984 “विस्तार में सार की सुन्दरता”
34(34)03-05-1984 “परमात्मा की सबसे पहली श्रेष्ठ रचना - ब्राह्मण”
35(35)07-05-1984 “बैलेन्स रखने से ही ब्लैसिंग की प्राप्ति”
36(36)09-05-1984 “सदा एकरस उड़ने और उड़ाने के गीत गाओ”
37(37)11-05-1984 “ब्राह्मणों के हर कदम, संकल्प, कर्म से विधान का निर्माण”
38(38)126-08-1984 “लक्ष्य प्रमाण सफलता प्राप्त करने के लिए स्वार्थ के बजाए सेवा अर्थ कार्य करो”
39(39)19-11-1984 “बेहद की वैराग्य वृत्ति से सिद्धियों की प्राप्ति”
40(40)21-11-1984 “स्व-दर्शन धारी ही दिव्य दर्शनीय मूर्त”
41(41)26-11-1984 “सच्चे सहयोगी ही सच्चे योगी”
42(42)28-11-1984 “संकल्प को सफल बनाने का सहज साधन”
43(43)03-12-1984 “सर्व समर्थ शिक्षक के श्रेष्ठ शिक्षाधारी बनो”
44(44)05-12-1984 “सम्पूर्ण काम जीत अर्थात् हद की कामनाओं से परे”
45(45)10-12-1984 “पुराने खाते की समाप्ति की निशानी”
46(46)12-12-1984 “विशेष आत्माओं का फर्ज
47(47)19-12-1984 “सर्वश्रेष्ठ, सहज तथा स्पष्ट मार्ग”
48(48)19-12-1984 “सर्वश्रेष्ठ, सहज तथा स्पष्ट मार्ग”
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